डॉ दिलीप अग्निहोत्री
केंद्र सहित डेढ़ दर्जन प्रदेशों में भाजपा की सरकार है। इन सरकारों ने किसी जाति, वर्ग या मजहब के भेद भाव को अपने शासन का आधार नहीं बनाया। ऐसे में जब भाजपा के तीन चार सांसद दलितों के हितों की उपेक्षा का आरोप लगाते है, तो उनकी नियत पर आशंका होती है।अच्छा हुआ इनकी हकीकत बहुत जल्दी सामने आ गई। यह लगभग साफ हो गया कि ये दलितों के लिए नहीं निजी महत्वाकांक्षा के लिए बेकरार है। वैसे भाजपा में दलित नेताओं, कार्यकर्ताओं की कमी नही है। इनके सहयोग और समर्थन के बल पर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी है। लेकिन कई बार निष्ठावान दलित कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करके बाहर से आये लोगों को तरजीह देना भारी पड़ता है। भाजपा ने बहराइच, इटावा, सोनभद्र में यही किया था। उसने बसपा की पृष्ठिभूमि वाली सावित्री बाई फुले को बहराइच, अशोक दोहरे को इटावा और सपा की पृष्ठिभूमि वाले छोटे लाल को सोनभद्र से लोकसभा का चुनाव लड़ाया था। ये लोकसभा पहुंचे। चार वर्ष तक इन्हें भाजपा अच्छी लगती रही। आम चुनाव से कुछ समय पहले इन्हें उस पार्टी में कमियां दिखाई देने लगी है, जिसने इन्हें सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचाया।
एक शायर की लाइन इन पर सटीक बैठती है–
गैरों की दोस्ती पर
क्यों ऐतबार करिए।
ये बेरुखी करेंगे
बेगाने आदमी है।।
देश मे सर्वाधिक दलित सांसद, विधायक, भाजपा के पास है। झारखंड, छत्तीसगढ़, जैसे दलित, वनवासी राज्यों में भाजपा सर्वाधिक लोकप्रिय पार्टी है। जहां भी उसकी सरकार है, वहाँ मजहब और जातिभेद के आधार पर कार्य करने के उसपर आरोप नहीं है।
ऐसे में दो चार दलित सांसदों के आरोप से भाजपा पर फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन सांसद सावित्री बाई फुले, छोटेलाल संखवार, अशोक दोहरे की असलियत अवश्य सामने आ गई है। लेकिन इस प्रकरण ने भाजपा को भी सबक दिया है। इन दोनों तथ्यों पर विचार की आवश्यकता है।
छोटेलाल संखवार, सावित्री बाई फुले, अशोक दोहरे आदि आम दलित के लिए परेशान नहीं है। सच्चाई यह कि इन्हें केवल अपनी चिंता है। पिछले लोकसभा चुनाव में इन्हें लगा कि भाजपा इनकी मुराद पूरी कर सकती है, इसलिए ये भाजपा का गुणगान करते लगे।
तब इनका कहना था कि दलितों और वनवासियों के हित भाजपा में सुरक्षित है। भाजपा इन्हें समझ नहीं सकी। वस्तुतः ऐसे लोग केवल अपने हित के लिए परेशान रहते है। जबसे कार्यो के आधार पर टिकट देने का भाजपा ने ऐलान किया है, तब से इनकी बेचैनी बढ़ गई है। तभी से ये बयानों के द्वारा दूसरे दलों में को इशारा दे रहे है। कहा तो यह भी जा रहा है कि विपक्षी दल इनकी मजबूरी का फायदा उठा रहे है। वह इन्हें टिकट का लालच देकर भाजपा के खिलाफ बयान दिलवा रहे है। लेकिन वहां से टिकट की गारंटी नहीं है।
क्योकि इन क्षेत्रों से उनके कार्यकर्ता जोर आजमाइश कर रहे है। चुनाव के पहले अपनी ही पार्टी के खिलाफ हमला बोलकर इन नेताओं ने अपनी विश्वशनियता कम कर ली है। ये जहाँ जाने के बारे में सोच रहे है, वह इनकी पैतरेबाजी का फायदा तो उठा रहे है, लेकिन विश्वास करना आसान नहीं है।
इनकी छवि यह बन गई है कि ये टिकट के लिए कभी भी पैतरा बदल सकते है। इनके रिकार्ड से यह प्रमाणित होता है।
सावित्री बाई फुले ने अपनी सियासी पारी बसपा से शुरू की थी। बसपा ने जिला पंचायत चुनाव में टिकट नहीं दी, तो उसे छोड़ दिया। निर्दलीय चुनाव लड़ी।
मतलब साफ है, उन्हें पहले भी दलितों या किसी पार्टी विशेष से लगाव नहीं था। राजनीति में उनकी महत्वाकांक्षा थी। उसको पूरा करने के लिए ही वह इस क्षेत्र में आई थी। बसपा ने टिकट नहीं दी तो उस पर दलितों के हित मे काम न करने का आरोप लगा दिया। भाजपा में आ गई। अब भाजपा बहुत अच्छी और दलितों का कल्याण करने वाली हो गई। भाजपा ने समीक्षा के बाद टिकट की बात उठाई तो, दलित और संविधान पर संकट आ गया। इसी प्रकार अशोक दोहरे बसपा में थे, मंत्री भी बने। तब बसपा बहुत अच्छी थी। फिर भाजपा में आ गए। अब भाजपा सबसे अच्छी हो गई। पुनः टिकट के लिए रिपोर्ड कार्ड देखने की बात चली तो दलितों के खिलाफ मुकदमा नजर आने लगा। छोटेलाल संखवार गीतों के माध्यम से सपा का गुणगान करते थे। तब सपा से अच्छा कुछ नहीं था। सपा ने टिकट नहीं दी तो वह जनजाति वीरोधी हो गई। भाजपा ने टिकट दी तो वह सबसे अच्छी हो गई। स्थानीय चुनाव में पार्टी की जगह परिवार को वरियता देने के आरोप लगे। टिकट कटने की आशंका सताने लगी, तो सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना लगा दिया।
जहाँ इन नेताओं की राजनीति फिर बदलाव के मुकाम पर है, वही से भाजपा को चिंतन करना शुरू करना चाहिए। बहराइच, इटावा और सोनभद्र से भाजपा ने अपने समर्पित दलित, वनवासी कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया होगा। इनकी जगह वह होते तो ऐसे रंग न बदलते। वह कहते कि भाजपा में दलितों का पूरा सम्मान है। सोनभद्र में तो जनसंघ , भाजपा का उस समय से प्रभाव है जब वह सत्ता के मुकाबले से बाहर हुआ करती थी। उसे बड़ी मुश्किल से कुछ सीट नसीब होती थी। तब सोनभद्र शिवसम्प्त और सूबेदार प्रसाद जैसे अनुसूचित जाति जनजाति के नेताओं का जलवा हुआ करता था। शिवसम्पत लोकसभा और सूबेदार प्रसाद विधानसभा का चुनाव जीतते थे। वैसे लोगो की कमी पिछले लोकसभा चुनाव में भी नही थी। लेकिन जिनकी निष्ठा सन्दिग्ध थी, उनपर मेहरबानी हुई। इस प्रकरण ने भाजपा को भी विचार का मुद्दा दिया है।
भाजपा की विचारधारा के प्रति समर्पित लोगों को उचित तरजीह देनी होगी। बाहरी लोग प्रायः लहर का लाभ उठाते है। अपने भविष्य पर किंचित आशंका होते ही, इन्हें पैतरा बदलने में कोई संकोच नहीं होता। ये सोचना गलत होता है कि कोई पार्टी छोटेलाल संखवार, अशोक गौतम, सावित्री बाई फुले के नाम से चुनाव में सफल होती है। इसके विपरीत इन्हें लहर का फायदा मिलता है। इनकी जगह पार्टी समर्पित दलित कार्यकर्ता को टिकट देती तो वह भी विजयी होते। ये अपनी पार्टी को बदनाम कर रहे है, वह होते तो भाजपा सरकार द्वारा दलितों के कल्याण के लिए शुरू की गई कारगर योजनाओं की बात करते। जिसने करोड़ो दलितों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया है।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







