उसे बैठा दो.. उसे मिला लो,
तुम्हारे तीरों में दम नहीं है,
तुम अपने तरकश को बम बना लो..
पता नहीं राम है कौन इसमें,
पता नही कौन है इसमे रावण।
कहीं है दस सरों वाली बुद्धि,
कहीं है दस सर पर भारी ताकत।
कहीं पे भाले, कहीं पे चालें,
सब हारने की कगार पर हैं,
मगर अभी तक ना हार मानी।
उसे हराने की कोशिशों में अक़ल लगा दो, जेहन घुमा दो।
इसे सुला दो, उसे बैठा दो।
उसे पटा लो, उसे मना लो..
तुम्हारी बस ये ही कशमकश है, किसे फंसा लो, किसे रिझा लो।
तुम्हारी कोशिश की हर उम्मीदें सिसक रही हैं दरक रही हैं।
ना तीर आया है काम कोई,
ना धार है ना है नोक कोई।
बहुत हैं नाजुक ये उंगलियां भी, बेचारी सहमी हैं ये निगोड़ी।
गुबार नफरत का अब निकालो,
जहर को बारूद सा अब बना दो।
तुम अपनी तरकश को ही मुकम्मल सा बम बना लो।
उसे उड़ा दो..
उसे डरा दो, उसे हिला दो, उसे हरा दो, उसे सता लो।
तुम्हारी कोशिश की तरकशों को धता बताकर फिर जीत जाये।
तो फिर बचा बस रही है रस्ता,
गले लग लो, गिले भुला दो।
नहीं अगर इस बात को हो राज़ी,
फिर नफरतों का नया सा कोई शग़ल बना लो,
उसे हरा दो… उसे
बैठा दो…
-नवेद शिकोह







