अच्छा सोचने की सीमा है पर गलत सोचने की कोई सीमा नहीं है। हम उसे चाहे जितना विस्तार दे सकते हैं। आचार्य महाप्रज्ञ ने कहा है कि दूसरों के बारे में गलत सोचने से उसका कुछ नहीं बिगड़ता है बल्कि जो किसी के बारे में गलत सोचता है उसका ही अहित होता है। पर आदमी को प्रथम दृष्टा यह नहीं समझ में आता है। अनजाने में हम अपना कितना नुकसान कर जाते हैं जिसकी भरपाई मुश्किल ही नहीं असंभव होती है।
प्राचीनकाल से यह चला आ रहा है दुर्योधन ने पांडवों के लिए गलत सोचा विनाश को प्राप्त हुआ। कंस ने, रावण ने जिसने भी गलत दिशा में कदम उठाए आखिर बरबाद हो गए। जितने भी आक्रमणकारी इस देश में आए सबको यहां से भागना पड़ा या विनाश को प्राप्त हुए आज उनका कोई नाम लेवा नहीं है।
पर इतिहास ऐसी चीज है जिसमें जब किसी अच्छे आदमी या घटना का जिक्र आता है तो बुरे आदमी बुरी घटना का जिक्र पहले आता है। इसलिए हमें इतिहास से लोगों की जीवनियों से सबक लेना चाहिए और अपने सोच को शुभ सकारात्मक, रचनात्मक बनाना चाहिए। निषेधात्मक, सोच बहुत हानिकारक है शरीर मन आत्मा सबको व्यथित करता है।
मैं समझता हूं कि आम आदमी यह समझता भी है पर अपने को रोक नहीं पाता। बुरे विचार उस पर हावी हो जाते हैं विचार प्रवाह में वह बह जाता है। बुरे विचार गले में पत्थर बांधकर नदी में उतरने वाली बात है डूबना निश्चित है। कोई हमें बचा नहीं सकता। किनारे नहीं लगा सकता। जब से दुनिया बनी है सभ्यता का विकास हुआ है। अच्छे-बुरे का खेल चल रहा है। अब यह हम पर है कि किस रास्ते पर चलें किस पर नहीं।
सबका भला सोचो, अपना अहित करने वाले का भी हित ही चाहो तुम्हारा कभी अहित नहीं होगा। भगवान ने मन एक ऐसी वस्तु बनाई है उसमें सुभाव, कुभाव, सुविचार, कुविचार सब आते हैं। हमारा वजूद कितना भारी है उस पर निर्भर करता है कि विचार हम पर कितना प्रभाव डालते हैं। कैसा वातावरण और वृत्त बनाते हैं। कभी-कभी आदमी दूसरों से उसकी नियत जाने बिना इतना प्रभावित हो जाता है कि अंजाम सोच नहीं पाता।
माता सीता रावण की बातों में आ गईं, लक्ष्मण रेखा पार कर दी, उनका अपहरण हुआ फिर आगे क्या क्या हुआ आपको मालूम है। कई बार लोगों की बातें बहुत लुभावनी लगती हैं। हमें हिप्ोटाइज कर दिया जाता है। हम बह जाते हैं जब होश आता है तब तक बरबादी हो चुकी होती है। इसलिए कहा है भाई न धोखा दो, धोखा खावो दोनों ही स्थितियां गलत हैं। हम इतना सरल और सीधे भी नहीं होना चाहिए कि कोई भी हमें सीधे पेड़ की तरह काट डाले। न हमें चालाक और धूर्त बनना है न मूर्ख। हमारा हित हमारे ही हाथों में सुरक्षित है। इसलिए अच्छा सोचे रोज हर समय, हर जगह, हर परिस्थिति में और सुख आनंद प्राप्त करें।







