लखनऊ, 29 अप्रैल। अखबार और पत्रकारों के रोजगार बचाने के लिए जो पत्रकार भाई और पत्रकार संगठन आज गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी से मिले, उन सब को सैल्यूट।
मुझे और मेरे जैसे हजारो अखबार कर्मियों को उन पत्रकारों का एहसान मानना चाहिए है जो एक नेक काम के लिए जी -जान से लगे हैं। अखबार बचाने के संघर्ष में हमारे जैसे तमाम लोग किसी कारण से आज उनके साथ नहीं खड़े थे लेकिन ये हमारी पत्रकारिता/रोजगार और अखबार बचाने के संघर्ष में अपने तमाम जरूरी काम छोड़ कर संघर्ष करते रहे। ये भी अच्छी बात है कि इस लड़ाई में कोई एक संगठन नहीं बल्कि लखनऊ के बहुत सारे संगठन अपना योगदान दे रहे हैं।
इस बीच कुछ दुखद बातें सामने आ रही हैं। जीएसटी की तलवार से अखबारों को बचाने का प्रयास कर रहे पत्रकारों की कार्यप्रणाली पर नकारात्मक टीका टिप्पणी भी की जा रही है। जो बेहद गलत है।
तस्वीर का दूसरा रुख:
- अखबार बचाने की लड़ाई में शामिल कुछ लोग इतनी बचकानी और बेतुकी हरकतें कर रहे हैं कि यदि जीएसटी जैसी दिक्कत यदि खुद से खत्म होने वाली भी हो तो खत्म ना हो।
- अपरिपक्व हरकतों के कारण तमाम पत्रकार चाह कर भी इस जायज लड़ाई में आगे नहीं आ पा रहे हैं।
ईमानदारी से आप खुद ही बताइये:
एक ही समस्या के लिए लगभग एक ही समय पर, एक ही व्यक्ति को तीन-चार पत्रकारों के गुट अलग-अलग ज्ञापन देने पंहुचे तो क्या ये ठीक है ?
और तब जब कुछ दिन पहले ही लगभग साढ़े सात सौ पत्रकारों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से संवाददाता समिति का गठन किया। 6 महीने की मेहनत, शोर-शराबे और संघर्षों के बाद सरकार के सहयोग से विधानसभा जैसे विशिष्ट स्थान में चुनाव करवाकर लम्बी-चौड़ी कार्यकारिणी को नेतृत्व की जिम्मेदारी दी गयी।
इसके बाद भी यदि अन्य संगठन भी पत्रकारिता के हित में अपनी सक्रियता जारी रखें तो ये और भी बेहतर और स्वागत योग्य बात है।
लेकिन क्या इन तमाम संगठनों को पत्रकारिता के इतने बुरे समय मे भी आपस में सामंजस्य नहीं बनाना चाहिए है ?
एक व्यक्ति एक ही व्यक्ति के पास एक ही मांग का ज्ञापन सौंपे। उसके आधे घंटे के बाद वही व्यक्ति उस ही व्यक्ति के पास उस ही मांग का ज्ञापन दूसरे संगठन के दल के साथ सौंपे, क्या इसे बचकानी हरकत नहीं कहा जायेगा! क्या कोई परिपक्व पेशेवर ऐसा करेगा? इस तरह से दूसरा आपको कितनी गंभीरता से लेगा!
फोटो खिंचवाना कोई बुरी बात नहीं है। ज्ञापन वगैरह देते समय दस्तावेज के तौर पर तस्वीर ली ही जाती है।
लेकिन अपने मुश्किल दौर की दुहाई देने के दौरान हम अलग-अलग आड़े तिरछे तरीके से.. अपने साथियों को धक्के देते हुए.. सुरक्षा कर्मियों से भिड़ते हुए… प्रोटोकाल तोड़ते हुए… हंसते हुए-खिलखिलाते हुए… अपना बदन अकड़ाकर कैमरे की आंखों में आंखे डालते हुए… गृहमंत्री की मौजूदगी में गंभीर चर्चा के दौरान सैल्फी मंडी का बाजार लगाते हुए. सैल्फी की होड़ मचा दें तो क्या ये ठीक है?
-नवेद शिकोह







