डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स को लाखों मिलते हैं, स्वतंत्र पत्रकारों को क्यों उपेक्षा? समय आ गया बदलाव का!
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में छोटे-मझोले अखबारों और पत्रकारों को सरकारी विज्ञापनों से आर्थिक सहारा मिलता रहा है, लेकिन स्वतंत्र (फ्रीलांस) पत्रकारों के लिए मेहनताना के रास्ते बेहद सीमित हैं। अब वरिष्ठ पत्रकारों, विशेषज्ञों और पत्रकार संगठनों की मांग है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग जनकल्याणकारी योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत, पीएम आवास योजना, किसान सम्मान निधि आदि) पर आधारित विशेष लेख, फीचर, इंटरव्यू, समीक्षा और पब्लिक ओपिनियन के लिए स्वतंत्र पत्रकारों के लेखन कौशल का उपयोग करे।
यह कदम न केवल प्रतिभावान स्वतंत्र पत्रकारों को आर्थिक मदद पहुंचाएगा, बल्कि छोटे अखबारों को उच्च गुणवत्ता वाला जनहित कंटेंट उपलब्ध होगा। इससे अखबारों की कैटेगरी में सुधार संभव है और विज्ञापन आवंटन में पारदर्शिता भी बढ़ेगी।
इस बाबत उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति के निर्वाचित कार्यकारिणी सदस्य नवेद शिकोह ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, लखनऊ के निदेशक विशाल सिंह को एक पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने लघु समाचार पत्र-पत्रिकाओं व इससे जुड़े अखबार कर्मियों के उत्थान, सहयोग एवं आर्थिक मदद के लिए विभाग से ठोस कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से स्वतंत्र पत्रकारों को जनहित योजनाओं पर लेखन के अवसर और मेहनताना देने की अपील की है।
बताते चलें कि पूर्व में राजनाथ सिंह सरकार के दौरान स्वतंत्र पत्रकारों को जनहित योजनाओं पर लेखन का अवसर मिलता था और उचित मेहनताना भी प्रदान किया जाता था। वर्तमान में बड़े चैनल, अखबार (जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक जागरण) और एजेंसियां (पीटीआई) स्वतंत्र पत्रकारों को जगह तो देती हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में पेमेंट नहीं होता। सेवानिवृत्त वरिष्ठ पत्रकार और योग्य फ्रीलांसर अब सूचना विभाग से अपेक्षा कर रहे हैं कि सकारात्मक, जनकल्याणकारी कंटेंट के लिए उन्हें शामिल किया जाए।
सूचना विभाग पहले से ही कई कदम उठा रहा है जैसे पत्रकार कल्याण कोष (वित्तीय वर्ष 2025-26 में 80.31 लाख रुपये स्वीकृत) और डिजिटल मीडिया पॉलिसी (जिसके तहत इन्फ्लुएंसर्स को योजनाओं के प्रचार पर ₹2 लाख से ₹8 लाख तक मासिक राशि मिल सकती है)। यदि स्वतंत्र पत्रकारों के लिए भी समान लेखन-आधारित योजना शुरू हो, तो यह पत्रकारिता के उत्थान और सरकारी योजनाओं के बेहतर प्रसार में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
पत्रकार समुदाय का सवाल अब जोर पकड़ रहा है उन्होंने कहा कि क्या सूचना विभाग इस मांग पर गंभीरता से विचार करेगा? फिलहाल यह आवाज तेज होती जा रही है और पत्रकारों को उम्मीद है कि विभाग जल्द ही कोई सकारात्मक कदम उठाएगा।







