जी के चक्रवर्ती
2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद से विधानसभा, लोकसभा उपचुनाव हो चाहे नगर निगम चुनाव, सभी में मोदी और राहुल गांधी की परीक्षाओं से जुड़ गए हैं। अनेकों राजनीतिक दलों एवं चुनाव विश्लेषकों द्वारा ऐसा माना जाने लगा कि अब कर्नाटक में होने वाले चुनाव से आगामी वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में आने वाले परिणाम की भविष्य वाणीयां या कयासों का दौर अभी से प्रारम्भ हो जाएगा कि चुनाव में कौन जीतने या हारने वाला है। ऐसे में भला कर्नाटक विधानसभा के चुनाव के परिणामों की भविष्य वाणियों के प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता है? यदि हम गौर करे तो यह कह सकते हैं कि दुनिया में खेले जाने वाले किसी भी खेल में शायद इतने सेमीफाइनल नहीं खेले जाते होंगे जितने की हमारे देश की राजनीति में खेले जाते हैं। अभी ताजा दौर है कर्नाटक में होने वाले चुनाव का तो इसमें 15 मई तक का समय कर्नाटक विधानसभा का चुनाव और लोकसभा चुनाव के मध्य सेमीफाइनल चलेगा। यह स्वाभाविक सी बात है कि इन चुनाव के नतीजों के बाद परस्पर विरोधी दलों के लोगों के मध्य अनेको तरह के दावों का दौर चल पड़ेगा। जैसा कि अभी हाल ही के बिहार प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में केंद्र की सत्तासीन पार्टी की हार के बाद कई राजनीतिक आचार्यों ने तो यहाँ तक घोषणा कर डाला कि अब मोदी के प्रभाव की समाप्ति का दौर प्रारम्भ हो चुकी है।
देश के किसी भी प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से किसी भी पार्टी की जीतने पर विपक्षी पार्टियों द्वारा अक्सर ऐसी बातें कही जाने लगती है कि इस दफ़े वोट मतदाताओं को बरगलाकर हासिल की गई है। अभी गुजरात में कांग्रेस लगातार सातवीं दफ़े हार जाने के बाद ऐसा कहा जाने लगा कि यह हार-हार नहीं वल्कि इसे कांग्रेस एवं राहुल गांधी की नैतिक जीत माना जाना चाहिए। किसी की हार कैसे उसकी जीत मानी जायेगी इस बात पर ऐसा कहा जाने लगा कि राहुल गांधी ने इस तरह का धुआंधार प्रचार किया कि भाजपा की सीटें पहले से कम हो गईं। जैसा कि हम सभी लोगों जानते है कि कांग्रेस पार्टी देश की एकलौती ऐसी पार्टी है जिसने कभी पूरे देश में एकक्षत्र राज किया लेकिन मौजूदा समय में उसके नेताओं के बयानों से ऐसा आभास होता है कि एक के बाद एक राज्य की सत्ता से बाहर हो जाने के बाद भी लापरवाही से उन्हें ऐसा कहते हुए सुना जा सकता है कि इस हार का बदला, वोह फलाने चुनाव में अवश्य लेगी जैसे इस हर से उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ा हो। कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में होने का उसका तगमा उससे छीन जाने के बाद भी उस पार्टी की आगे आने वाले भविष्य में उसको कैसे सुधारा जाये या अगला चुनावी रणनीति कैसा बनाया जाना चाहिए या कैसे चुनाव लड़ना है इस तरह की तमाम बातों पर शायद पार्टी के आलाकमान ने कभी ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझा चुनाव लड़ना एवं लड़ाना भी एक तरह की राजनीतिक कला है और इस कला में मौजूदा प्रधानमंत्री एवं भाजपा अध्यक्ष जैसे लोग इस कला में पारंगत लगते हैं। किसी भी पार्टी के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं की अहमियत को अस्वीकारा नही जा सकता है, अन्य राज्यों से नेताओं या कार्यकर्ताओं के आजाने से वहां पर के चुनाव को जिता नही जासकता है इस बात को भाजपा ने वखूबी समझ लेने के अलावा दूसरी महत्वपूर्ण सबक, अपने विरोधी की ताकत का सही आंकलन और उसी के आधार पर अपनी पार्टी के लिए रणनीति तैयार करने जैसी बातों को भाजपा ने बखूबी आत्मसात किया है।लोकसभा में पंद्रह मिनट बोलने जैसी मांग राहुल ग़ांधी द्वारा करके पहले ही उन्होंने गलती कर ली। इससे उनके सबक लेने के स्थान पर उन्होंने अपनी गलती को पुनः दोहरा कर लाल कपड़ा दिखने जैसी बात कर डाला जिसके प्रतिउत्तर में किये कहे गए बात के परिपेक्ष्य मे मोदी ने मंगलवार को कर्नाटक में अपने पहली चुनाव सभा में राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें लोकसभा में 15 मिनट बोलने का मौका मिल जाए तो मोदी खड़े नहीं हो पाएंगे। मोदी ने इस चुनौती को नामदार और कामदार का मुद्दा बना दिया। मोदी ने इसे अमीर एवं गरीब के साथ ही साथ वंशवाद की राजनीतिक परम्परा से जोड़ दिया।
प्रधानमंत्री मोदी को यह बात अच्छी तरह पता है कि कर्नाटक में लड़ाई सिद्दरमैया बनाम येद्दयुरप्पा के बीच हुई तो भाजपा की हार निश्चित है। मोदी ने एक माझे हुए राजनेता की तरह यह किया कि येद्दयुरप्पा भाजपा की कमजोर कड़ीं तो हैं ही साथ ही साथ भाजपा की यह मजबूरी भी इसलिए उन्होंने पूरे चुनाव अभियान की धरातल को ही बदलते हुए इसे राज्य से हटाकर वखूबी राष्ट्रीय फलक पर ले आए। अब यह सिद्दरमैया बनाम येद्दयुरप्पा की बजाय मोदी बनाम राहुल का मुद्दा बन गया।इस तरह शायद कांग्रेस को अब तक यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई होगी कि संवाद की कला मोदी का मजबूत पक्ष है एवं राहुल गांधी की यह सबसे बड़ी कमजोरी है। संसद हो या संसद से बाहर, जब भी वे बोलते हैं तो विरोधियों को उपहास करने का मौका जरूर मिल जाता हैं। किसी भी क्षेत्र में शागिर्दी की एक अवधि निश्चित होती है। कांग्रेस के राहुल गांधी को संसद में आए चौदाह वर्षों का समय गुजर जाने के बाद भी क्या वे अभी तक सीख ही रहे हैं? इन सब के साथ ही साथ एक परेशानी यह भी है कि नया सीखने के चक्कर मे शायद वह पिछला भूल जाते हैं। जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति में भी समझदारी होना बहुत आवश्यक है। .लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं







