स्वर्ग की सीढ़ी है वाराणसी, यहाँ की गंगा आरती दूर- दूर से देखने आते है लोग
कुम्भ मेले की वजह से यहां भी जुटर्ते है लाखों श्रद्धालु, क्योकि आस्था का प्रतीक है वाराणसी
वाराणसी का मूल नगर कभी कशी हुआ करता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व की थी, जिस कारण ये आज भी यह एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। सामान्यतः वाराणसी शहर को कम से कम 3000 वर्ष प्राचीन माना जाता है। नगर मलमल और रेशमी कपड़ों, इत्रों, हाथी दाँत और शिल्प कला के व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र रहा है। गौतम बुद्ध (जन्म 567 ई.पू.) के काल में, वाराणसी काशी राज्य की राजधानी हुआ करती थी।

पृथ्वी एवं स्वर्ग के मध्य वाराणसी को सबसे बड़े तीर्थ के रूप जाना जाता है:
आपको इस शहर की यात्रा रोमांचित कर देने वाली और साथ ही साथ यहाँ का अनुभव आपके अंतस मन के गहराई तक परिवर्तन कर देने में सक्षम है। पृथ्वी एवं स्वर्ग के मध्य वाराणसी को सबसे बड़े तीर्थ के रूप में मन-जाना जाता है। हिंदुओं के लिए तो जीवन में एक बार यहां आकर गंगा स्नान करना बहुत आवश्यक कहा गया है। पवित्र शहर काशी, पवित्र नदी गंगा और देवों में देव महादेव यानी भगवान शिव के संगम के कारण ही यह मोक्षदायिनी शहर के नाम से जाना जाता है।
यह हिंदुओं, बौद्ध एवं जैन समाज के धार्मिक, आध्यात्मिक विचारों और मान्यताओं का गढ़ रहा है। इसीलिए इसे प्राचीन शिक्षा, धर्म, दर्शन, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, संगीत, कला-साहित्य और आध्यात्मिकता का सांस्कृतिक केंद्र होने के साथ ही साथ यहाँ पर वहने वाली गंगा घाट किनारे का रोजमर्रा का जीवन और शाम के समय होने वाली गंगा आरती इस पवित्र नदी के प्रति लोगों का द्रष्टिकोण बदल देती है।
बनारसी सिल्क की साड़ियां एवं कालीन ने इसे वैश्विक बाजार में भी अपनी तरह का विशेष पहचान दिलायी है।
गंगा घाट और मंदिरों में सुबह के समय व्यतीत करना आध्यात्मिक स्तर पर मन एवं चित्त को शुद्ध एवं आनंद प्रदान करने वाला होता है।
बौद्ध धर्मावलंबियों का तीर्थ स्थल सारनाथ:
सारनाथ, जो बौद्ध धर्मावलंबियों का बहुत बड़ा तीर्थ पर्यटन स्थल है। ऐसा कहा जाता है कि बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं पर सारनाथ में दिया था। इसे महाधर्म चक्र परिवर्तन के नाम से भी जाना जाता है। धम्म स्तूप एवं यहाँ के अन्य सभी निर्माण यह संकेत देती है कि प्रचीन काल में इसकी किस प्रकार की अहमियत थी। चौखंडी स्तूप यह वह जगह है जहाँ पर प्रथम बार सारनाथ आए भगवान बुद्ध की अपने पहले पांच शिष्यों से मुलाकात हुई थी। यह जगह धर्मराजिका स्तूप और मूलगंध कुटी विहार जैसी पुरातात्विक महत्व की संरचनाओं के दृष्टि से यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने 273-232 ईसापूर्व यहां बौद्ध संघ के प्रतीक स्वरूप विशालकाय एक स्तंभ स्थापित किया, जिसके शीर्ष पर स्थापित सिंह वर्त्तमान समय में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह है।
जहां साल भर भक्तों की भीड़ जुटी रहती है वह है विंध्यांचल:
विंध्य पर्वत श्रंखलाओं के बीच मिर्जापुर के पास गंगा के किनारे पर स्थित यह स्थान एक और तीर्थ है। देवी विंध्यवासिनी की शक्तिपीठ लाखों श्रद्धालुओं को अपनी मान्यताओं के कारण प्रत्येक वर्ष अपनी ओर आकर्षित करती है।
इसके आसपास अष्टभुजा माँ का मंदिर और कालीखोह मंदिर जैसे कई प्रमुख तीर्थस्थल भी हैं, जहां साल भर भक्तों की भीड़ जुटी रहती है। अप्रैल और अक्टूबर माह की नवरात्रि में यहाँ पर होने वाले भव्य समारोह का आयोजन देखने वाला होता है।

सोनभद्र:
यह भारत के उन प्राचीनतम स्थलों में से एक है, जहां के शिव द्वार और रेणुकेश्वर मंदिर के आसपास महाभारत काल के प्रतीक और मूर्तियां देखने को मिलती हैं। विजयगढ़ महल इस इलाके के उन शक्तिशाली शासकों की गाथा बयां करते है।
यहां पुरातात्विक, धार्मिक और प्रकृति से जुड़ी नायाब वस्तुये देखने को मिलेंगी। गुफाओं की दीवारों पर उकेरे गए चित्रों में एक बड़ा आकर्षण है। प्रकृति से प्रेम रखने वालों के लिए लखनिया और मुक्खा प्रपात आकर्षक स्थल है। यह स्थान विख्यात फॉसिल पार्क से सटी हुई है। यहां से कुछ ही दूर पड़ती है कैमूर वन्य जीव अभ्यारण है। यहां जंगली जानवरों और पंक्षीयों की नाना प्रकार के प्रजातियां देखने को मिलती हैं।
चुनार:
वाराणसी से 40 किमी पर स्थित यह जगह धर्म, इतिहास और प्रकृति का एक अद्भुत संगम है। गंगा के किनारे विंध्य पर्वत श्रृंखला पर बसे जंगल में दिन के समय यादगार ट्रैकिंग की जा सकती है। यहाँ पर चुनार का किला एक और दर्शनीय स्थल है, जिसके आगोश में लगभग 1000 साल पुराने विशाल पत्थरों से बने मंदिर स्थित हैं। इसके साथ ही यहां का झिरना नाला पर बना प्रसिद्ध दुर्गा खोह मंदिर प्राकृतिक रॉक शेल्टर का बेहतरीन नमूना है। इसकी दीवारों पर दुर्लभ कला आकृतियां एवं चित्र उकेरे गये हैं। -जी के चक्रवर्ती







