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    Home»Indian tourism spots

    मावरिंगखांग बांस ट्रेक, मेघालय: जहां पत्थरों की प्रेम कहानी हवा में लहराती है और पूर्वोत्तर भारत का जादू दिल को छू जाता है!

    ShagunBy ShagunApril 6, 2026 Indian tourism spots No Comments4 Mins Read
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    Mawryngkhang Bamboo Trek, Meghalaya
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    Post Views: 406

    प्रस्तुति : नीतू सिंह

    नॉर्थईस्ट कोई “दूसरा देश” नहीं, बल्कि भारत की खूबसूरत पहचान है। यहां आने के लिए पासपोर्ट नहीं, बस सम्मान और बिना नस्लवाद वाला दिल चाहिए। यह बात आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है – और सबसे बेहतरीन उदाहरण है मावरिंगखांग बांस ट्रेक (जिसे Bamboo Trail भी कहते हैं)। मेघालय के पूर्वी खासी हिल्स जिले के वाहखेन गांव में बसा यह ट्रेक न सिर्फ एडवेंचर का खजाना है, बल्कि खासी जनजाति की संस्कृति, प्रकृति के साथ सामंजस्य और भारत की एकता का जीवंत प्रमाण भी।

    शिलांग से महज 40-50 किलोमीटर (लगभग 2 घंटे की ड्राइव) दूर यह ट्रेक Wahrew नदी की खाईयों के किनारे-किनारे बांस के पुलों, लकड़ी की सीढ़ियों और चट्टानों पर बना है। कुल दूरी करीब 3.5 किलोमीटर (राउंड ट्रिप), लेकिन 3-5 घंटे लग जाते हैं। ऊंचाई पर झूलते बांस के पुल, नीचे बहती नदी, चारों तरफ हरे-भरे जंगल और धुंध भरी पहाड़ियां – ये सब मिलकर इसे मेघालय का सबसे थ्रिलिंग और “डरावना” ट्रेक बना देते हैं। लेकिन डर के साथ-साथ यहां रोमांच भी उतना ही है! ट्रेक मीडियम डिफिकल्टी का है, पर हाइट्स से डरने वालों के लिए चुनौती भरा। एंट्री फी ₹50 (बड़ा) और ₹20 (बच्चा)।Mawryngkhang Bamboo Trek, Meghalaya

    ट्रेक की खासियत:

    स्थानीय खासी कारीगरों ने बांस, केन रस्सियों और नाखूनों की मदद से बिना किसी मॉडर्न टूल के ये पुल और सीढ़ियां बनाई हैं। ट्रेक Wahkhen गांव से शुरू होता है, नदी तक उतरता है, फिर चट्टानों के किनारे-किनारे Mawkhlieng Cliff और Mawmoit Viewpoint होते हुए U Mawryngkhang रॉक पर खत्म होता है। रास्ते में झरने, जंगल और पक्षियों की चहचहाहट साथ देते हैं। वापसी में नदी में डुबकी भी लगाई जा सकती है (लोकल्स शॉर्ट्स-तौलिए किराए पर देते हैं)।

    अब आपको सुनाते हैं यहां के दो रोचक किस्से , जो इस ट्रेक को सिर्फ वॉक नहीं, बल्कि कहानी बनाते हैं उम्मीद है पसंद आएंगे : –

    पहला किस्सा: पत्थरों का प्रेम युद्ध – ‘किंग ऑफ स्टोन्स’ की लोककथा

    खासी लोककथाओं में पत्थरों को भी जानदार माना जाता है। U Mawryngkhang (पत्थरों का राजा) को पड़ोसी राज्य की खूबसूरत चट्टान Kthiang से प्यार हो गया। लेकिन Kthiang का विवाह दूसरे शक्तिशाली पत्थर U Mawpator से हो चुका था, जो उसे सुखी नहीं रखता था। Mawryngkhang ने Kthiang को शरण दी। गुस्साए Mawpator ने युद्ध छेड़ दिया। भयंकर लड़ाई में Mawpator ने Mawryngkhang का बायां हाथ काट दिया, लेकिन Mawryngkhang ने आखिरकार जीत हासिल की और Mawpator का सिर काटकर खाई में फेंक दिया (जो आज भी viewpoint से दिखता है!)। Kthiang अब Mawryngkhang के साथ रहने लगी।

    आज भी ट्रेक के अंत में खड़े विशाल U Mawryngkhang रॉक पर “कटा हुआ हाथ” का निशान दिखाई देता है – जैसे कहानी अभी भी जिंदा हो! यह किस्सा ट्रेक को सिर्फ एडवेंचर नहीं, बल्कि मिथोलॉजी का जीवंत अनुभव बना देता है।

    दूसरा किस्सा: बांस के पुलों का चमत्कार – खासी इंजीनियरिंग का रहस्य

    ट्रेक पर 50 से ज्यादा बांस के पुल और लैडर्स हैं, जो चट्टानों से चिपके हुए खाई के ऊपर लटकते हैं। इनका निर्माण कैसे हुआ? स्थानीय खासी आदिवासी बिना किसी भारी मशीन या आधुनिक उपकरण के, सिर्फ पारंपरिक ज्ञान से ये बनाते हैं। बांस को मोड़कर, केन रस्सियों से बांधकर और नाखूनों से मजबूत करके उन्होंने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाया है – ठीक वैसे जैसे मेघालय के प्रसिद्ध लिविंग रूट ब्रिज।

    वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – https://x.com/i/status/2040800130266513784

    एक ट्रैकर ने बताया, “पहली बार पुल पर कदम रखते हुए दिल की धड़कन रुक गई, लेकिन लोकल गाइड ने मुस्कुराते हुए कहा कि ‘भाई, ये हमारे दादा-परदादा का काम है, भरोसा रखो!’” यही इंजीनियरिंग और आतिथ्य सत्कार इस ट्रेक को यादगार बनाता है। यहां आने वाले पर्यटक अक्सर कहते हैं कि मुख्यलैंड से आए लोग यहां खासी परिवारों के घर रुककर उनकी संस्कृति, चावल-मांस की थाली और गर्मजोशी को हमेशा याद रखते हैं।

    कैसे पहुंचें और टिप्स:

    • बेस्ट टाइम: अक्टूबर से अप्रैल (मॉनसून में पुल फिसलनदार हो सकते हैं, बचें)।
    • कैसे जाएं: गुवाहाटी एयरपोर्ट से शिलांग (3-4 घंटे), फिर वाहखेन। लोकल गाइड जरूरी (ट्रेक अकेले न करें)।
    • क्या ले जाएं: अच्छे ट्रैकिंग शूज, रेनकोट, पानी, स्नैक्स, और सबसे जरूरी – सम्मान भरा दिल!

    मावरिंगखांग बांस ट्रेक सिर्फ एक हाइक नहीं, बल्कि भारत की विविधता का जश्न है। यहां आओ, तो सिर्फ नजारे देखने नहीं, बल्कि खासी संस्कृति को अपनाने, लोकल लोगों से बात करने और यह समझने कि पूर्वोत्तर हमारा अपना है – खूबसूरत, विविध और गर्व का विषय। तो अगली ट्रिप प्लान करो, पासपोर्ट मत लाना, सिर्फ दिल ले आना!

    Shagun

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