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    कैराना में सिंबल और सियासत

    By May 22, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    जब कोई नेता एक पार्टी छोड़ कर दूसरी में शामिल होता है, तो उसे दलबदल कहते है। लेकिन अब गठबन्धन में भी इसका नया संस्करण आ गया है। इसके तहत एक मित्र दल अपने उम्मीदवार  को  दूसरे के सिंबल पर चुनाव लड़ने भेजता है। तकनीकी रूप से वह उस पार्टी का हो जाता है, जिसका उसे सिंबल मिला है। लेकिन मूल स्थान से जुड़ाव अपनी जगह पर रहता है। तकनीकी रूप में तो यह भी दल बदल हुआ । लेकिन अब भारतीय राजनीति में इसके लिए भी दलबदल जैसा कोई लोकप्रिय शब्द तलाशना होगा।
    यह भारतीय राजनीति का नया रूप है। भविष्य में यह भी व्यापक स्तर पर चलन में आ सकता है। कैराना लोकसभा चुनाव में यही नजारा है। एक पार्टी छोड़ कर दूसरी से चुनाव लड़ने के उदाहरणों की देश  में कमी नहीं है। ऐसे नेता तत्काल प्रभाव से रंग, रूप, विचार बदल लेते है। जिसका गुणगान करते थे, उस पर बड़ी बेदर्दी से हमला बोल देते है। यह स्थिति तब आती है, जब दोनों संबंधित पार्टियां परस्पर प्रतिद्वंदी होती है। गठबन्धन के दोस्ताना दलबदल का प्रयोग नया है।
    कितना दिलचस्प कि यहां विपक्ष का उम्मीदवार कई चरणों मे तय हो सका। पहले चरण में सपा ने महिला नेता को प्रत्याशी बनाने का निर्णय लिया। दूसरे चरण में  तय हुआ कि राष्ट्रीय लोकदल से गठबन्धन होगा। तीसरे चरण के तहत सपा की नेता दिल्ली रवाना हुई, वहां उन्होंने अजित सिंह के समक्ष राष्ट्रीय लोकदल की सदस्यता ग्रहण की। इस प्रकार गठबन्धन के प्रत्याशी का चयन पूरा हुआ।
    समाजवादी पार्टी में पहले ही बता दिया था कि वह किसी सूरत में कैराना सीट नहीं छोड़ेगी, लेकिन शुक्रवार को पहले दौर की बातचीत में जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के बीच एक-एक सीट के बंटवारे को लेकर सहमति बन चुकी थी। अखिलेश यादव ने नूरपुर सीट आरएलडी को देने की बात कही थी, लेकिन अजीत सिंह ने जब अखिलेश यादव से इस सीट की मांग की तब अखिलेश ने इस शर्त पर यह सीट छोड़ने की बात कही कि उम्मीदवार तबस्सुम हसन की होंगी। अजीत सिंह के सामने कोई विकल्प ही नहीं बचा। इस समझौते ने उनका अपमान किया है। एक तो वह सपा की नेता को चुनाव लड़ाएंगे। रालोद का लोकसभा में एक भी सदस्य नहीं है। यदि वह जीत भी गई तो दलबदल कानून से ऊपर होंगी। जहाँ भी जाएगी,उसे शत प्रतिशत दलबदल माना जायेगा। हार गई तो ठीकरा भी रालोद पर फूटेगा।
    सपा को कहने का मौका मिलेगा की रालोद की वजह से हार गए। कैराना से आरएलडी के लिए तबस्सुम हसन चुनाव लड़ेंगी। भाजपा की घेराबंदी करने को समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच यह समझौता धोखे पर आधारित है। गठबंधन के लिए  रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी बहुत बेकरार थे।  वह खुद अखिलेश से मिलने लखनऊ आये थे। बताया गया कि वार्ता सफल रही। भाजपा को हराने को एकजुट होकर लडऩे पर सहमति बनी है। दावा है कि आमचुनाव में भी गठबंधन बना रहेगा। रालोद द्वारा जयंत को साझा उम्मीदवार बनाकर चुनाव लड़ाने की तैयारियों को अखिलेश ने नामंजूर कर दिया था।
    सपा नेताओं का कहना है कि कैराना में पिछले चुनाव परिणामों को देखते हुए रालोद की दावेदारी बेहद कमजोर है। कैराना व नूरपुर उपचुनाव को लेकर गठबंधन की जोड़तोड़ में कांग्रेस हाशिए पर है। स्थानीय नेता चुनाव लडऩे को उत्साहित नहीं है । विपक्ष जिस एकता की बात कर रहा है, उसमें कांग्रेस को कोई तरजीह नहीं दी गई थी। उपाध्यक्ष इमरान मसूद संकेत दे चुके हैं कि अगर जयंत चुनाव मैदान में उतरते हैं तो समर्थन को तैयार हैं।लेकिन वर्तमान उम्मीदवार का समर्थन करना उनके लिए मुश्किल होगा।  कांग्रेस की पांच में से तीन विधानसभा क्षेत्रों में स्थिति मजबूत है। सूत्रों का कहना है कि इमरान व हसन परिवार के बीच तनातनी छिपी नहीं है। सपा हसन परिवार से प्रत्याशी उतारती है तो कांग्रेस कोई पेंच फंसा सकती है।
    कांग्रेस के उपाध्यक्ष इमरान मसूद ने कहा था कि जयंत चौधरी लड़ेंगे तभी वह समर्थन देंगे। लेकिन किसी ने कांग्रेस से सलाह नहीं ली। जबकि कांग्रेस की पांच में से तीन विधानसभा क्षेत्रों में स्थिति कुछ ठीक बताई गई। कैराना लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इस लोकसभा सीट में शामली जिले की थानाभवन, कैराना और शामली विधानसभा सीटों के अलावा सहारनपुर जिले के गंगोह व नकुड़ विधानसभा सीटें आती हैं। मौजूदा समय में इन पांच विधानसभा सीटों में चार भाजपा के पास हैं और कैराना विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के पास है। बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मैदान में उतरी समाजवादी पार्टी ने शामली व नकुड़ सीटें कांग्रेस को दी थीं।
    कहने को यह गठबन्धन है। लेकिन एक दूसरे पर किसी का विश्वास नहीं है। क्या राष्ट्रीय लोकदल में ऐसा कोई नहीं था, जिसे कैराना से उम्मीदवार बनाया जाता। लेकिन सपा को इस पर विश्वास नहीं था।  क्या राष्ट्रीय लोकदल सपा के उम्मीदवार का समर्थन नहीं कर सकती थी, उसने ऐसा नहीं किया, क्योकि उसका सपा पर विश्वास नहीं था। जनता को धोखा देने की क्या जरूरत थी। किसी का उम्मीदवार , किसी का सिंबल और नाम । ऐसे गठबन्धन पर किस प्रकार भरोसा किया जाए। विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी के लिए कहा गया कि यूपी को यह साथ पसन्द है, उसकी अब बेकद्री हो रही है। गठबन्धन में उसे कोई पूंछ नहीं रहा है। जिस पार्टी के कहा जाता था कि इनसे सावधान रहना, ये भाजपा से मिल सकती है, अब उनका साथ पसन्द आ गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समझौते में राष्ट्रीय लोकदल का अपमान हुआ है। सपा जानती है कि बसपा, कांग्रेस और रालोद अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। दूसरी बात यह कि इनमें से किसी मे भाजपा से अकेले लड़ने का हौसला नहीं बचा है। इसलिए इनकी दोस्ती में दांव पेंच चलते रहेंगे।

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