कर्नाटक सियासी मिजाज: 1983 से लगातार चल रहा यह सिलसिला
बेंगलुरु, 24 मई। दक्षिण के राज्य कर्नाटक में सियासी उथल पुथल और बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व में महज दो दिन तक बीजेपी की सरकार के बीच राज्य में एक नया पैटर्न सामने आया है। कर्नाटक राज्य में उस पार्टी सरकार नहीं बन पाती जो केंद्र में सत्ता पर काबिज होती है। बीजेपी के सरकार बनाने के दौरान लगा था कि शायद इस बार यह परंपरा टूटेगी, लेकिन बहुमत न साबित करने के चलते सरकार के गिरने से साफ हो गया कि कर्नाटक और केंद्र में एक पार्टी एक साथ जल्द ही राज शायद नहीं करने वाली है। सुनकर अजीब लग सकता हैं लेकिन यह सच है।
दरअसल यह सिलसिला 1983 से शुरू है जब रामकृष्ण हेगड़े ने पहली बार राज्य में गैर-कांग्रेस सरकार बनाई। हेगड़े की जनता पार्टी की सरकार के दौरान केंद्र में कांग्रेस थी। उसके बाद 1989 में जब राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी तो केंद्र में जनता दल के नेतृत्व वाली नैशनल फ्रंट की सरकार आई जिसके प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह थे।
हालांकि,एक ही पार्टी ने केंद्र और राज्य में सरकार बनाने की कोशिश कई बार की,लेकिन ज्यादा समय तक ऐसी सरकार चल नहीं सकी। 2013 में कांग्रेस के सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने तो केंद्र में 2014 में बीजेपी की सरकार आ गई। इसी तरह केंद्र में संयुक्त मोर्चे की एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार और राज्य में जनता दल के जेएच पटेल की सरकार ज्यादा समय साथ नहीं चल सकी। हालांकि, 2004 में कांग्रेस की सरकार केंद्र में आने से पहले राज्य में 6 महीने पहले चुनाव कराकर दोनों जगह एक साथ सरकार चलाने की तत्कालीन मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा की योजना काम नहीं आई।
कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) की गठबंधन सरकार ज्यादा दिन तक चल नहीं सकी। ऐसा ही कुछ इस बार हुआ। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रचार के दौरान लोगों को केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने के फायदे बताने की कोशिश भी की लेकिन पार्टी फिर भी सरकार नहीं बना सकी। येदियुरप्पा की सरकार गिरने के बाद राजनीति समीक्षकों का कहना है कि इससे पता चलता है कि जब देश सोता है, कर्नाटक जागता है।
समीक्षक संदीप शास्त्री का कहना है कि इस बार के नतीजों से यह पता चलता है कि लोगों ने कांग्रेस के पक्ष में वोट नहीं दिया। इससे यह भी पता चलता है कि लोगों ने बीजेपी के पक्ष में भी वोट नहीं दिया। इसकारण 2019 के चुनावों से पहले कर्नाटक का मूड समझना मुश्किल कर दिया है। हालांकि,उनका मानना है कि इससे यह साफ होता है कि 2019 में कर्नाटक पार्टी को नहीं व्यक्तित्व को वोट करेगा।







