हेमंत कुमार/जी क़े चक्रवर्ती
अक्सर आपसी बातचीत में कोई आदमी ज्यादा बढ़चढ़ कर बात करता है और सुनने वालों को लगता है कि यह आदमी डींगें हांक रहा है और जैसा कह रहा है वैसा होगा नही तो लोग कह उठते है कि ज्यादा बात न बताओ, बड़े आये-‘यह मुहँ और मसूर की दाल’ लेकिन बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि यह मुहावरा प्रचलन में कैसे आया।
बात लखनऊ के नवाबों के ज़माने की है। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दखल के बाद सेना और दीवानी के सारे अधिकार कम्पनी सरकार ने ले लिये थे, तब नवाबों के पास शासन का कार्यभार बहुत कम रह गया था। अतएवं उन्होंने खाली समय में नवाबों के मनोरंजन और खानपान के शौक में अपना ध्यान और समय लगाया। यह पक्की बात है कि जिस विधा या कला को राज्य को राज्य और सरकार का वरदहस्त मिल जाता है, वह कला काफी तरक्की कर जाती है। लखनऊ के नबाव और दूसरे रईस लोग खाने पीने के काफी शौकीन थे। अतः उनके रासोइयों और खानसमो ने एक से एक लजीज और स्वादिष्ट पकवान बनाने में महारत हासिल की और वाहवाही व् प्रसिद्धि प्राप्त की। इसी सिलसिले में नवाब आसिफुद्दोला के सामने एक खानसामा पेश हुआ। नवाब साहब ने उससे पूछा कि आप क्या-क्या पका लेते है। इस पर खानसामे ने कहा हजूर मै केवल मसूर की दाल पकाता हूँ। नवाब ने कहा ठीक है। तनख्वाह पूछने पर उसने काफी पैसे मांगे। नवाब ने उसको सिर से पैर तक घूर कर देखा फिर कुछ सोचकर उसको नौकरी पर रख लिया।
इस पर खानसामे ने नवाब के सामने दो शर्तें रखी। पहली यह कि हुजूर जब आपकी दाल खाने की इच्छा हो तो दो दिन पहले ही बता दीजियेगा। दूसरी बात जब मै कहूं कि दाल तैयार है तो एक घंटे के अंदर ही खाना खा लीजियेगा। बात आई गई हो गई। एक दिन नवाब साहब को याद आया और उन्होंने खानसामे से दाल बनाने को कहा दिया। भोजन करने के समय नवाब से कोई मिलने आ गया। नवाब उससे बातचीत करने में मशगूल हो गये। खानसामे ने कहा हुजूर दाल तैयार है, चलिये। नवाब ने कहा तुम चलो हम आते हैं। आधे घंटे बाद खानसामे ने आकर फिर कहा कि हुजूर दस्तरख़्वान लग चुका है, आइये। नवाब ने कहा, बस मै अभी आया। लेकिन दो घन्टे के बाद भी नवाब खानें पर नहीं आये। इस पर खानसामा नाराज हो गया उसने दाल की हांडी ले जाकर महल के सामने मैदान में खड़े एक सूखे पेड़ की जड़ पर पटक दी और खुद कहीं चला गया। नवाब ने उसकी काफी खोज कार्रवाई किन्तु वह नहीं मिला। कहते है कि बाद में वह सूखा पेड़ फिर से हरा हो गया था।
नवाब की मौत के बाद वह खानसामा लखनऊ वापस आया और शहर के एक रईस के यहां नौकर हो गया। एक बार रईस के यहां मेहमान आए। इस अवसर पर खानसामे ने मसूर की दाल बनायी। लोगों ने खूब तारीफ की और उंगलियां चाट- चाट कर दाल खायी। अगले दिन रईस ने पूछा भाई दाल में क्या- क्या मसाले व सामान मिलाते हो। इस पर खानसामा बोला हुजूर क्या करेंगे जानकर आप जब कहेंगे मैं फिर बना दूंगा लेकिन मालिक के बार-बार पूछने पर उसने बताया कि मसूर की दाल दो पैसे की थी, किंतु उसमें जो मसाले डाले गए वह दो सौ सैंतिस रूपये के थे। इस पर मालिक को आश्चर्य हुआ कि दाल दो पैसों की और उसमें मसाले दो सौ सैतिस रूपये के। ऐसा कैसे हुआ ? वह खानसामे पर बहुत बिगड़ा और बोला तुम तो मेरा दिवाला ही निकाल दोगे। इस पर खानसामा भी नाराज हो गया और बोला बड़े आये हैं मसूर की दाल खाने वाले। यह मुंह और मसूर की दाल। इतना कहकर वह नौकरी छोड़कर चला गया। किंतु तब से यह मुहाविरा चल निकला ‘यह मुंह और मसूर की दाल।’







