उम्मीदें फिर धरी की धरी: पश्चिम एशिया में तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा –
अभी-अभी संघर्ष-विराम हुआ था, होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने की घोषणा हुई, लेकिन एक दिन भी नहीं बीता कि ईरान ने उसे फिर बंद करने का ऐलान कर दिया। अमेरिका को “समुद्री लुटेरा” कहकर ईरान ने अपना गहरा अविश्वास जताया। जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ कहा कि ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी हर हाल में और सख्ती से जारी रहेगी। नतीजा? शांति की किरणें एक बार फिर धुंधली पड़ गई हैं।
होर्मुज का बंद होना: सिर्फ एक जलडमरूमध्य नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था का गला

दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल और गैस का आवागमन इसी संकीर्ण जलमार्ग से होता है। ईरान के इस कदम से तेल की कीमतें फिर बढ़ने लगी हैं, वैश्विक व्यापार प्रभावित हो रहा है और कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। ईरान कह रहा है कि अमेरिका ने संघर्ष-विराम की शर्तों का उल्लंघन किया है, जबकि अमेरिका इसे “ब्लैकमेल” बता रहा है। दोनों तरफ से सख्त बयानबाजी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
शांति वार्ता पर सवालिया निशान
पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में दूसरा दौर शुरू होने वाला था। उम्मीद थी कि कुछ दिनों में ठोस प्रगति होगी। लेकिन तेजी से बदलते हालात के बीच अब यह तय नहीं कि अगली बैठक होगी भी या नहीं। ईरान ने कहा है कि फिलहाल कोई योजना नहीं है, जबकि अमेरिका अपनी टीम भेजने की बात कर रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति पहले संकेत दे रहे थे कि युद्ध जल्द खत्म होगा और संबंध सुधरेंगे, लेकिन अब उनकी ही घोषणाएं उन उम्मीदों को ठुकराती दिख रही हैं। दोनों पक्ष अभी भी “समझौते के मूड” में नजर नहीं आ रहे।
यूरोपीय मिशन और कूटनीति की सीमा
यूरोप के नेतृत्व में एक मिशन तैयार किया गया है, जो होर्मुज से जहाजों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करे। लेकिन बिना ईरान और अमेरिका के सहयोग के इसकी सफलता मुश्किल लगती है। हाल में अमेरिका द्वारा यूरोपीय देशों पर दिखाई गई नाराजगी ने भी इस प्रयास की उम्मीदों को कमजोर कर दिया है।
अब क्या किया जाए?
कूटनीति तेज होनी चाहिए। तनाव और दुश्मनी का अंत केवल बातचीत से ही संभव है। दोनों देशों को समझना होगा कि होर्मुज बंद रखना या घेराबंदी जारी रखना न सिर्फ उनकी अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि पूरी दुनिया को महंगाई और ऊर्जा संकट से जूझना पड़ेगा।
पाकिस्तान जैसे तटस्थ मध्यस्थ अभी भी सक्रिय हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए , ताकि छोटी-छोटी घटनाएं (जैसे जहाजों पर गोलीबारी या जब्ती) बड़े युद्ध में न बदल जाएं।
समय कम है।
दोनों पक्ष अगर जिद पर अड़े रहे तो न सिर्फ होर्मुज, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की शांति अधर में लटक जाएगी। कूटनीति की जीत तभी होगी जब दोनों देश अविश्वास की दीवार को थोड़ा सा भी तोड़ने को तैयार हों।
अभी वक्त है- बातचीत बढ़ाओ, तनाव घटाओ, वरना फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी: आग बुझाने की बजाय और घी डालना। दुनिया शांति की राह देख रही है – क्या वाशिंगटन और तेहरान सुनेंगे?






