डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कर्नाटक में भाजपा को रोकने का मंसूबा दिलचस्प मोड़ पर है। मलाईदार मंत्रालय को लेकर गठबन्धन में पेंच फंस गया है। अभी तक मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सत्ता का मोर्चा सँभाले है। इनके बीच भी कोई तालमेल नहीं है। शासन के स्तर पर अफरा तफरी का आलम है। प्रशासनिक अमला इनको खास अहमियत नहीं दे रहा है। क्योंकि उन्हें इस सरकार का भविष्य अनिश्चित है।यह मान लेते है कि अगले कुछ दिनों में मंत्रालय को लेकर दोनों पक्षों में सहमति बन जाएगी। लेकिन उस अवधि में जो हुआ, उसका जबाब नहीं मिल सकेगा। यदि यह भाजपा को रोकने का प्रयास था, मंत्रालयों को लेकर इतना हंगामा क्यों हुआ। यहां राजनीति के किसी आदर्श की चर्चा का उद्देश्य नहीं है। मलाईदार मंत्रालय अघोषित रूप से परिभाषित है। प्रत्येक सरकार में इनका महत्व होता है। दावेदारों में इसके प्रति लालसा भी रहती है। लेकिन कर्नाटक में तो बहुत बड़े दावे किए जा रहे थे। राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर भाजपा के विकल्प का मंसूबा बनाया जा रहा था। इसे सेकुलर ढांचे का संरक्षण बताया गया। भाजपा को मुल्क तोड़ने वाली पार्टी बताया गया। इसका दूसरा पक्ष यह था कि ये सभी विपक्षी पार्टियां देश को जोड़ने वाली है। ये सत्ता में रहेंगी, तभी मुल्क सुरक्षित रहेगा। इसके लिए बिना शर्त समर्थन का बड़ा दिल दिखाया गया। कहा गया यह मंसूबा। इतनी ऊंचाई की बातों की कलई मलाईदार मंत्रालयों ने खोल कर रख दी। सारे दावे आमजन को भृमित करने वाले थे। यह सत्ता के लिए स्वार्थ का गठबन्धन था।
अच्छा हुआ कि मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री की शपथ के फौरन बाद सोनिया और राहुल गांधी अमेरिका चले गए। यहां रहते तब भी मलाईदार मंत्रालयों पर समझौता आसान नहीं होता। कांग्रेस कर्नाटक के अलावा तीन राज्यो में बची है। यहां भी मुख्यमंत्री उसका नहीं है। ऐसे में पार्टी कोटे के मलाईदार मंत्रालयों से ही कुछ उम्मीद रहेगी। कुमारस्वामी और देवगौड़ा उस पर भी नजर जमाए है। ऐसे में राहुल भी क्या करते। कांग्रेस को यह कहने का मौका मिला कि उनके लौटने के बाद मंत्रालयों पर निर्णय होगा। यह केवल मुंह छिपाने वाला तर्क था। वीडियो कांफ्रेसिंग से लेकर मोबाइल जैसी तकनीक में ये तर्क नहीं ठहरते। इसके अलावा जब जेडीएस को बिना शर्त समर्थन दिया गया था ,तब ये कुछ मंत्रालयों की बात कहा से आ गई। इसके बाद तो सोनिया और राहुल गांधी की कोई भूमिका ही नहीं थी। यदि वह भाजपा को रोकने के लिए बिना शर्त समर्थन का फार्मूला बना कर विदेश गए थे, तो अब मंत्रिमंडल का गठन लटका क्यों है।
सच्चाई यह है कि स्वार्थ का संचार ऊपर से नीचे तक है। सभी इस बहती नदी में हाँथ धो लेना चाहते है। इसी को सेकुलर सियासत का नाम दिया गया था। असलियत में यह स्वार्थ के अलावा कुछ नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस व जदएस की सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों के बंटवारे को लेकर विवाद सुलझा नहीं है। गृह और वित्त मंत्रालय को लेकर ज्यादा टकराव है। लेकिन भूतत्व, खनिज, सिंचाई, लोकनिर्माण भी मलाईदार की सूची में आते है। जब गठबन्धन में अविश्वास का वातावरण होता है, तब स्थाई समाधान मुश्किल हो जाता है। झारखंड में मधु कोड़ा ने इसी का फायदा उठाया था। कर्नाटक सरकार धीरे धीरे उसी रास्ते पर बढ़ रही है। कुमारस्वामी ने कांग्रेस के अनेक दिग्गजों से वार्ता की, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। इससे जाहिर है कि मसला गंभीर है। मलाई की चाहत दोनों खेमों में समान रूप से है।
कुमार स्वामी ने माना कि वह कांग्रेस की दया पर है। राज्य की जनता ने मुझे और मेरी पार्टी को खारिज किया है ।मैं राज्य की जनता के दबाव में मुख्यमंत्री बना हूं। कांग्रेस जो कहेगी वही करुंगा।
कुमारस्वामी का यह कहना बिल्कुल सही है कि कर्नाटक की जनता ने उनकी पार्टी को खारिज किया है। लेकिन यह कहना गलत है कि वह जनता की मर्जी से मुख्यमंत्री बने है। जनता तो उन्हें सैंतीस सीट देकर फैसला सुना चुकी है। वह स्वयं लालच के चलते कांग्रेसी जाल में फंसे है।
कहा जा रहा है कि शर्मिन्दी से बचने के लिए कुछ लोगों को मंत्री बनाया जा सकता है । इनमें आर वी देशपांडेय, एच के पाटिल, डी के शिवकुमार शामिल है। सिद्धरमैया सरकार के अधिकांश मंत्री चुनाव हार गए थे।जो जीते है वह मौका छोड़ना नहीं चाहते। जेडीएस को सीमित क्षेत्र में ही जीत मिली है। जहाँ जीते है ,वहां से मंत्री बनने का ज्यादा दबाब है। जिन जिलों में उसके विधायक नहीं है, वहां से कांग्रेस की दावेदारी ज्यादा है। जाहिर है कि मलाईदार मंत्रालयों की मारामारी ने भाजपा रोको अभियान को हास्यस्पद बना दिया है। अविश्वास और स्वार्थ पर आधारित इस सरकार से बेहतर उम्मीद नहीं कि जा सकती। मलाईदार मंत्रालय के दीवाने जहाँ भी रहेंगे गड़बड़ी करेंगे। इस प्रकार के मॉडल आमजन को निराश करेंगे।







