जी क़े चक्रवर्ती
अभी हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि हम इस बात को नजरअन्दाज नहीं कर सकते है कि बीते चार सालोँ में मोदी सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के लिए बहुत कुछ किया अवश्य है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अभी देश के औसत किसानो को उन सभी योजनाओं के परिणाम सफल होते नहीं दिख रहे हैं, जो खेती को उनके लिए लाभदायक बनाने के लिए लागू की गई हैं।
निश्चित तौर पर इस पर बात तभी बनेगी जब देश के अधिकतर किसानों को यह भरोसा हो जाए कि अगले कुछ ही वर्षों में उनकी आय वास्तव में दोगुनी होने वाली है। जबकि मोदी सरकार बार-बार इस बात को दोहरा रही है कि वह वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दुगनी करने करने में कामयाब होगी। वे इस बात के लिए कृतसंकल्प भी है और इस लक्ष्य के प्रप्ति के लिए वे एक के बाद एक कदम भी उठाते जा रहे हैं, लेकिन यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि मौजूदा समय में किसानों की हालत में उतनी तेजी से सुधार होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है कि जिससे किसानों को ऐसा लगने लगे कि निश्चित तौर पर अगले तीन-चार वर्षों में उनके लिए खेती एक मुनाफे का सौदा बन जाएगी।
यहाँ पर यह भी ध्यान दिए जाने योग्य है कि अगले वर्ष यानीकि 2019 में देश में होने वाले आम चुनाव में अभी एक वर्ष की देरी है, इसलिए मौजूदा सरकार को इस बात पर ध्यान देना होगा कि किसानों की इस तरह की बेचैनी को कैसे ख़त्म करें। इसके लिए सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि किसानों को उनके कृषि उत्पाद के लागत से अधिक मूल्य मिले जिससे उनके खेती से होने वाले आय से उनका और उनके परिवार के लोगों का जीवन-यापन करने के लिए आवश्यक संसाधनों पर होने वाले खर्चो को आसानी से संभाल सकें।
यह निश्चित तौर पर बहुत ही अच्छी बात कही जाएगी कि सरकार दो दर्जन से अधिक फसलों के समर्थन मूल्यों में कृषि में लगने वाले लागत का डेढ़ गुना देने की तैयारी करने में जुटी हुई है, हाँ यह बात अवश्य है कि अभी तक इस प्रश्न का उत्तर सामने निकल कर नहीं आया है कि आखिर वह लागत मूल्यों का निर्धारण किस प्रकार करेगी और उसका स्वरुप कैसा होगा? कृषि पर लगने वाले लागत मूल्यों के निर्धारण की प्रक्रिया चाहे जैसी भी हो, लेकिन वह किसानों के हितों की रक्षा करने एवं उन्हें संतुष्ट करने वाला अवश्य होना चाहिए। जिससे उन तमाम किसानों को भी यह अहसास हो कि उनके कृषि उत्पाद पर होने वाले आय या उनके कृषि उत्पाद में घोषित किये गए समर्थन मूल्यों के आधार पर ही उनसे उनके उत्पाद खरीदे जाए।
देश का कृषि मंत्रालय इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकता कि कई बार संतोषजनक समर्थन मूल्यों की घोषणा तो कर दी जाती है लेकिन वास्तव में उस मूल्य पर कृषि उपज की बिक्री हो पाना संभव नहीं हो पाता है क्योंकि देश की सभी सरकारी एजेंसियां किसानों से पर्याप्त अनाज खरीदने में सक्षम नहीं होतीं है। इस तरह के वास्तविक समस्याओं का निराकरण के लिए कोई ऐसी व्यवस्था किये जाने की आवश्यकता है कि जिससे किसान लोग इस बात से भली -भांति परिचित हो जाएं कि कौन-कौन सी फसलों की खेती करना उनके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है? अकसर यह देखने में आया है कि किसान लोग इस बातों को सोचकर भी खेत में फसल नहीं उगा पाते हैं कि उनकी उपज के सही दाम या लाभ मिलेंगे भी, कि नहीं। कभी-कभी उनके द्वारा अधिक पैदावार कर लिए जाने से भी उनके उत्पाद के सही दाम नहीं मिल पाते हैं और उन्हें भरपूर हुये पैदावार के दुष्परिणामों को भोगने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
इस तरह के बातें किसी से छिपी नहीं कि ऐसे में किसानों को यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि कहीं हमारी उपज कम या ज्यादा तो नहीं होगी कि जिससे हमारे फसल पर लगे लागत से भी कम आमदनी होगी। इस तरह की स्थिति में हमारे किसान अपनी फसल पर सही निर्णय नहीं ले पाते हैं जिससे उनकी आमदनी में इजाफा हो सके। ऐसी स्थिति में अच्छा तो यही होगा कि इस बात पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि कुछ फसलों की खेती को आवश्यकता से अधिक बोये जाने की क्षेत्रफल पहले से तय कर दी जाए जिससे अधिक उपज होने पर भी स्थित किसानों को नुकसान उठाने की नौबत ही न आये।







