सरकार की लगातार कोशिशों के बावजूद देश में मिलावटी सामानों का कारोबार बेरोकटोक चल रहा है। शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण वस्तुएं न सिर्फ कम होती जा रही हैं, बल्कि इनके सेवन से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
भारतीय खाद्य एवं मानक प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में देशभर में पांच लाख से ज्यादा खाद्य प्रतिष्ठानों के निरीक्षण के बाद दो लाख से अधिक नमूने लिए गए। इनमें से करीब चालीस हजार नमूने मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। इनमें सबसे ज्यादा बीस हजार नमूने अकेले उत्तर प्रदेश से थे। बाकी राज्यों की स्थिति भी बेहतर नहीं कही जा सकती।
यह समस्या नई नहीं है। जब भी खाद्य पदार्थों के नमूने जांच के लिए लिए जाते हैं, उनमें मिलावट के मामले अक्सर सामने आते हैं। त्योहारों के मौसम में तो यह और साफ दिखता है, लेकिन सामान्य दिनों में भी हालात अलग नहीं होते। पिछले एक महीने में लखनऊ में हुए छापों में भी कई तरह की गड़बड़ियां पकड़ी गईं।

मिलावट के मामलों में वृद्धि की एक बड़ी वजह यह है कि पकड़े गए मामलों में भी आरोपी बच निकलते हैं। प्रयोगशालाओं में नमूनों की जांच में काफी समय लगने से कार्रवाई में देरी होती है और दोषियों को बचने का मौका मिल जाता है। नतीजा यह कि कानून का खौफ खत्म हो गया है। केंद्र सरकार के दावों के बावजूद ज्यादा मुनाफा कमाने वाले इस अवैध कारोबार पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा।इस देशव्यापी समस्या का समाधान सख्त नियमों और तेज कार्रवाई से ही संभव है।
सरकार को उन कमियों को भी दूर करना होगा जिनकी वजह से गलत काम करने वाले आसानी से बच निकलते हैं और सजा तक नहीं पहुंच पाते। आमतौर पर छापे के बाद प्रतिष्ठान बंद कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद वही कारोबार फिर से शुरू हो जाता है।
जरूरत इस बात की है कि नियमों को और सख्त बनाया जाए तथा जांच व कार्रवाई की प्रक्रिया को तेज किया जाए, ताकि मिलावट का यह चक्र टूट सके।






