पुराने नियमों में बड़ी दवा कंपनियों को मिलाता था लाभ
नई दिल्ली, 05 जून। दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने मार्केटिंग और प्रचार करने वाली कंपनियों को भी जिम्मेदार ठहराने की योजना तैयार की है। योजना के अनुसार इन कंपनियों पर भी दवा निर्माण कंपनियों की तरह ही दवा नियामकों के उल्लंघन पर कार्रवाई की जाएगी। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया को बताया कि इस बाबत प्रस्ताव पर जल्द ही मुहर लग सकती है। इसके मुताबिक, जहां नकली दवाइयां पाई जाएंगी या दवाओं की गुणवत्ता के साथ समझौता किया जाएगा, वहां दवाओं की मार्केटिंग करने वाली कंपनियों को भी दंडित किया जाएगा। मौजूदा नियमों के तहत अगर दवा नियामकों का उल्लंघन किया जाता है तो केवल निर्माताओं को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है।
नियमों में बदलाव के बाद दवा मार्केटिंग कंपनियों को कानूनों के किसी भी उल्लंघन पर उत्तरदायी ठहराने के लिए औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम को संशोधित किया जाएगा,ताकि निर्माण एवं मार्केटिंग दोनों कंपनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। अधिकारी ने बताया कि कोई दवा नकली अथवा कम गुणवत्तापूर्ण है या नहीं इसका निर्णय दवा नियामक (सीडीएससीओ) करेगा। नए कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दवाओं की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं हो।
मौजूदा नियमों का लाभ उठाकर बड़ी दवाई कंपनियां केवल उन दवाओं को बाजार में पेश करती हैं, जिन्हें वे सस्ते दामों पर छोटी कंपनियों से बनवाती हैं और इनकी अपने नाम से मार्केटिंग कर मोटा मुनाफा कमाती हैं। इसके बाद यदि दवाओं में कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो सिर्फ दवा तैयार करने वाली कंपनी ही जिम्मेदार मानी जाती थी। लेकिन नया नियम फार्मा कंपनियों को मरीजों को दवा बेचे जाने से पहले उसकी गुणवत्ता की सीधी निगरानी के लिए प्रोत्साहित करेगा और नकली दवाओं पर लगाम लगेगी। नए नियमों के तहत अगर दवा नियामक ने पाया कि किसी दवा की गुणवत्ता मानकों के अनुसार सही नहीं है तो उस केस में 3 से 5 साल की जेल हो सकती है। इसके अलावा नकली दवाएं पाए जाने पर संबंधित मामले में उम्रकैद की सजा का प्रस्ताव भी शामिल किया गया है।
सरकार इसके लिए कई उठा रही है जैसे घरेलू बाजार में दवाइयों की पैकिंग पर 14 डिजिट का यूनिक कोड छपा होगा। इसके जरिये आप एसएमएस करके आसानी से असली-नकली दवा की पहचान कर सकेंगे। सरकार इसके तहत 300 दवा ब्रांडों और उसके खर्च होने के पैटर्न का डाटा बैंक बनाएगी। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी सभी दवाओं का मूल्य निर्धारण अपने हाथ में लेगा, अभी 24 प्रतिशत दवाएं ही नियंत्रण में हैं।







