जी क़े चक्रवर्ती
हमारे देश मे मात्र दिल्ली ही में नही बल्कि देश के कई अन्य शहरों में एवं महानगरों का वातावरण धूल एवं धुएं से घिरे हुआ है अभी दो दिन पहले ही दिल्ली का प्रदुषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था धूल के गुबार से दिल्ली धुंधला गयी थी। इस खतरनाक प्रदुषण से दिल्लीवासियों का श्वास लेना दूभर हो रहा है। देश मे धुएं-धूल से होने वाले प्रदूषण फैलते हुए इतनी दूर तक जा पहुंची है कि उससे देश के पहाड़ी इलाके भी प्रदूषण से अछूते नही रह गए हैं। फिलहाल देश के महानगरों में धूल भरी धुंध छाई हुई है जिसका प्रमुख कारण राजस्थान से उठने वाले धूल भरी आंधियां है जो पूरे देश मे विशेष कर इसके सीमावर्ती प्रदेशों में हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेश अधिक प्रभावित हैं। देश की राजधानी दिल्ली जैसे शहरों में इससे सटे गुडगांवा हरियाणा में पराली जलाने से उठने वाले धुएं से आसपास के इलाकों में धुंध जैसा फैलाने से वायु प्रदूषित हो जाती है जिसकी वजह से यहां पर श्वास लेना दूभर हो जाता है। ऐसी स्थिति में विशेष कर हॉस्पिटल में एडमिट श्वास के मरीजों को ज्यादा परेशानी होती है।सम्पूर्ण देश के शहरी क्षेत्रों के अलावा आज पहाड़ी क्षेत्रों, जैसे उत्तराखंड जैसे जगह पर भी जलवायु परिवर्तन एवं और पर्यावरण में हुए बदलावों के कारण हुए यहां के निवासीयों को नुकसान का खामियाजा आज तक भुगतना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून समेत कई मैदानी इलाको में वायु- प्रदूषण अपने संवेदनशील स्तरों तक जा पहुंचे हैं। यहां पहाड़ों की दुर्दशा का एक अलग ही स्वरूप है। जहां बांध परियोजनाओं जैसे बड़े परियोजना के अंतर्गत बहुत बड़े पैमाने पर हो रहे निर्माण कार्यों से यहां के हालात को और ज्यादा चिंताजनक एवं खतरनाक बना दिया है। यहां तक कि वर्ष 2013 में हुए जलप्रलय से तबाह हुए केदारनाथ धाम एवं समूची केदारनाथ घाटी में चल रहे निर्माण कार्यो के कारण यहां पर प्रदूषण होना स्वाभाविक सी बात हैं।

देश मे अंग्रेजी हुकूमत के दौरान मसूरी, नैनीताल एवं देहरादून जैसी शिवालिक और मध्य हिमालय से घिरी हुई घाटी में यहां के पर्यावरण को देखते हुए बसेरे बनाए गए थे, वर्तमान मे यह स्थान अलग- अलग कारणों से पूरी तरह से प्रदूषण की शिकार हो चुके हैं। अपने मौसम एवं स्वछ वातावरण के लिए विख्यात दून घाटी में धूल, धुएं एवं शोर की घाटी में तब्दील हो चुकी है। यहां पर जंगलों की कटान एवं पहाड़ी इलाकों में हो रहे अंधाधुंध निर्माण कार्यों से यहां के वायु, जल, एवं मिट्टी के बने रास्तों को उजाड़ ऊबड़-खाबड़ बना दिया हैं। जिसके परिणामस्वरूप यहां पर अप्रत्याशित रूप से भूस्खलन एवं अतिवृष्टि अधिक होने के साथ ही साथ यहां पर बाढ़ से तबाही होने वाले क्षेत्र की सीमाओं में बढ़ोत्तरी हो जाने से इनसे जुड़े आर्थिक व सामाजिक नुकसान तो हो ही रहे हैं ।
इसके अलावा इन पहाड़ों पर फैले जंगलों में लगने वाली आग से होने वाली नुकसान में विशेषतः यहां पर के पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचने वाला साबित हो रहा है जो किसी भी प्रकार से स्मॉग जैसे खतरे से कम नहीं है। वायु प्रदूषण की समस्या अकेले पहाड़ो की ही नही है वरन पारिस्थितिय जनक परिवर्तनों से पड़ने वाले प्रभावों से सम्पूर्ण देश धिरे-धीरे एक भयानक स्थिति में पहुंचता जा रहा है। बेशक अभी भी शहरों के लोगों के अपेक्षा पहाड़ों में लोग फिर भी स्वच्छ वायु में श्वास ले रहे हैं लेकिन अगर हम देश के माहनगरों की बात करें तो वहां की स्थिति और भी भयानक है। जगह-जगह रास्तों पर लगे कूड़े-कचड़े के ढेरों पर से रोज हजरों लाखों लोग अपने -अपने काम पर समय से पहुंचने की हबड़ी में रास्तों पर लगे इन कूड़े -कचड़े के ढेरों के ऊपर से होकर गुजर जाते है। इसके लिए देश की जनसंख्या जितनी जिम्मेदार है उससे कहीं अधिक हमारे साफ-सफाई रखने वाले लोग और महकमे के अफसरों के गैर जिम्मेदाराना कार्यों एवं उनके हरकतों से और भी अधिक गन्दगियां फैलती है।
वातावरण में वायु प्रदूषण मामले में रसायनों, सूक्ष्म या अति सूक्ष्म पदार्थ, या जैविक पदार्थों के वातावरण में फैलने से होने वाले प्रदूषण के मामले में, मुख्य रुप से हम लोगों की विशेष भूमिका रहती है। मनुष्यों के अलावा अन्य जीव जंतुओं को भी पर्यावरण से बहुत बड़ा नुकसान पहुँचाता है।
वायु प्रदूषण के कारण होने वाले मौतों में ज्यादा श्वास के रोगियों की ही होती है। वैसे तो साधारणतः वायु प्रदूषण की पहचान प्रमुख स्थायी स्रोतों से की जाती है, लेकिन इन स्थाई श्रोतों जैसे फैक्ट्रियों के चिमनियों से उगलता कला धुंएं के अलावा प्रदूषित वायु उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत मोबाइल, आटोमोबाइल्स, डीजल इंजन के अलावा कार्बन डाईआँक्साईड जैसी गैसें, जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार तो हीं ही साथ ही साथ ऐसी, फ्रिज जैसे यंत्रों में भरा जाने वाला गैस उत्पादन फैक्ट्रियों से उत्सर्जित होने वाली गैसें हैं जिसमें सल्फर डाइऑक्साइड अथवा डाक्लोरडाइफ्लोर मिथेन के जैसे गैसों के वायुमंडल में पहुंच कर धीरे-धीरे वहां के ओजोन पर्त में छिद्र पैदा कर दिए जाने से सूर्य की रोशनी जो पहले वायुमंडल में इस पर्त से छन कर पृथ्वी पर आती थी अब उसका प्रकाश सीधे हमारे पृथ्वी पर पड़ने से वातावरण में गर्मी फैलने लगी है जिसके कारण पहले की अपेक्षा अब सम्पूर्ण पृथवी के तापमान में बृद्धि होने लगी है। यदि इस स्थिति पर अभी से नियंत्रण नही किया जा सका तो निश्चित रूप से आगे आने वाले भविष्य में सम्पूर्ण भूमंडलीय वातावरण का तापमान इतना अधिक हो जाएगा कि व्यक्तियों को अपने नौकरी -पेशे काम-धंधे के लिये घर से बाहर निकलना दूभर हो जाएगा। ऐसी स्थिति के परिकल्पना मात्र से हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं तो जरा सोचिए कि यदि वास्तव में हमे ऐसी स्थिति से निपटना पड़े तो हमारा हश्र क्या होगा?







