- हिन्दी-उर्दू साहित्य अवार्ड कमेटी का अलंकरण समारोह व मुशायरा
- कुवैत के मो.आमिर को उर्दू अदब व डा.हरिओम को साहित्यश्री सम्मान
लखनऊ, 24 जून। ख्यातिप्राप्त रचनाकारों के सम्मान और उनकी शेरो-शायरी के बीच शनिवार की शाम ये एक अविस्मरणीय शाम रही। पेपरमिल कालोनी के क़ैफ़ी आज़मी प्रेक्षागृह में शनिवार शाम हिन्दी-उर्दू साहित्य अवार्ड कमेटी और कुवैत के आॅल इण्डिया कल्चरल एसोसिएन के संयुक्त तत्वावधान में आज शाम अलंकरण समारोह और मुशायरे का आयोजन किया गया।
पूरी तरह साहित्यिक रंग में रंगे इस आयोजन मे पूर्व राज्यपाल सिब्ते रज़ी व अन्य अतिथियों ने कुवैत के मोहम्मद आमिर बिन सलमान को उर्दू अदब अवार्ड-2017 और डा.हरिओम को साहित्यश्री सम्मान-2017 से अंगवस्त्र, सम्मान पत्र इत्यादि देकर नवाज़ा। इस अवसर पर कुवैत में 2017 में हुए अंतर राष्ट्रीय मुशायरे की सीडी का विमोचन भी हुआ।
यहां अतिथियों के तौर पर उनके साथ पूर्व मंत्री राजेन्द्र चैधरी, डा.मसूद अहमद, अरविन्द सिंह गोप और उत्तरप्रदेश उर्दू अकादमी की चेयरपर्सन आसिफ़ा ज़मानी, पूर्व मेयर दाऊजी गुप्त, राजा महमूदाबाद अमीर मोहम्मद ख़ान, वरिष्ठ कांग्रेस नेता अमीर हैदर और प्रो.रमेश दीक्षित भी आमंत्रित थे।
इस मुशायरे और कवि सम्मेलन का सुधी श्रोताओं ने देर रात तक आनन्द लिया। इस मौके पर वासिफ़ फ़ारुक़ी ने सुनाया-
गु़मान ओ वहम से निकलो यक़ीन तक आओ
अब आसमां से उतरकर ज़मीं तक आओ
अगर छुपाए हो ख़ंजर तो पीठ हाजिर है
अगर हो सांप तो फिर आस्तीन तक आओ
महशर आफ़रीदी का कहना था-
तेरी यादों का अब क्या तजि़्करा हो
मैं अपने हाफ़्ज़े में ख़ुद नहीं हूूं…….
ज़रा बाहों में हल्क़े और कस लो
मुहब्बत सांस लेना चाहती है
उर्दू ज़बां पर हसन काज़मी ने अदायगी की-
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
मैं भी इस मुल्क़ में उर्दू की तरह रहता हूं
उनका एक और शेर था-
ख़्वाब आंखों तक आते नहीं, कोई ताबीर लाते नहीं
सूने बिस्तर पर कल रात भर, नींद करवट बदलती रही
इश्क के बहाने दुनियादारी पर नज़र डालते हुए हसीब सोज़ ने पढ़ा-
नया नया है तिरा इश्क़ तुझको क्या मालूम
ज़रा सा हंस के बहुत देर रोना पड़ता है
मैं अपनी ज़ेब कटने का क्या मलाल करूं
मुहब्बतों में ख़ज़ाना भी खोना पड़ता है
चरण सिंह बशर के शेर ने बेपनाह तालियां बटोरीं- सर बचाइएगा तो दस्तार चली जायेगी
ग़र दस्तार बचाना है तो सर जाने दे
उनका एक और शेर था-
तुम तो हवा के कांधे से उतरे ही नहीं
फिर ये सर ए मग़रूर ज़मीन पर कैसे है
डा.निर्मल दर्शन की पंक्तियां थीं-
कौन कितना क़रीब है किसके ये पता दूर जाके चलता है
वक़्त की डोर छोड़ने के बाद आदमी सिर्फ़ हाथ मलता है
डा.नसीम निक़हत ने तरन्नुम में कहा-
ग़म की ग़र्द हटाकर फिर चेहरे को सजाना पड़ता है
हम ज़िन्दा हैं लोगों को ये याद दिलाना पड़ता है
जब अजदाद की लापरवाही बूढ़ी हवेली को बिकवा दे
आने वाली नस्लों को फिर कर्ज़ चुकाना पड़ता है
ख़ुद्दारी भी समझौते की बोली बोलने लगती है
मजबूरी में दुश्मन से भी हाथ मिलाना पड़ता है
ग़ज़लगोई करते हुए तरिक़ कमर ने कहा-
सर्द पड़ जाए ख़ून पानी न हो, सब्ज़ तहज़ीब ज़ाफ़रानी न हो
नफ़रतों का इलाज मुमकिन है, गर ये बीमारी ख़ानदानी न हो
खुर्शीद हैदर का मानना था-
ग़ैर परों पर उड़ सकते हैं हद से हद दीवारो तक
अम्बर पर तो वही उड़ेंगे जिनके अपने पर होंगे
बाराबंकी के उस्मान मिनाई ने सुनाया-
किसी को आज तलक हल न कल सका कोई
हर एक शख़्स इक उलझा सवाल लगता है
रामप्रकाश बेखुद ने पढ़ा-
हर जिस्म चाहता है मुझे रूह की तरह
मैं खुद को किसके-किसके बदन में उतार दूं
सैफ़ बाबर का कहना था-
सांसे नहीं हैं ज़िन्दा मगर नाम से तो हैं
वो याद सबको अपने किसी काम से तो हैं
इसके अलावा सम्मेलन में सम्मान पाने वाले रचनाकारों मोहम्मद आमिर बिन सलमान और डा.हरिओम ने भी अपनी बात रखी।







