डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारतीय शास्त्रों में माता पिता को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया। इसका उल्लेख केवल शास्त्रों तक में सीमित नहीं है, बल्कि देवताओं ने अपने व्यवहार से भी इसका प्रतिपादन किया है। इसी के आधार पर हिन्दू चिंतन में प्रथम पूज्य का निर्धारण तक किया गया। एक बार सभी देवों में यह प्रश्न उठा कि सर्वप्रथम किस देव की पूजा होनी चाहिए। शिव जी ने इसके लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की। कहा कि जो पृथ्वी की परिक्रमा करके प्रथम लौटेंगे, वह ही प्रथम पथम पूज्य होगा। सभी देव अपने वाहनों पर सवार हो चल पड़े। गणेश जी ने अपने पिता शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े रहे। कार्तिकेय अपने मयूर वाहन पर आरूढ़ हो पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे। शिव जी ने कहा कि माता पिता की परिक्रमा करने वाले गणेश ही विजयी हुए है।माता पिता के महत्व को रेखांकित करने वाली इससे सुंदर कोई कथा नहीं हो सकती। इससे प्रमाणित है कि माता पिता की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में माता ,पिता और गुरु को अति विशिष्ट स्थान दिया गया। इनकी सेवा वंदना तीर्थ यात्रा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बताई गई। काल चक्र के साथ इनका वियोग भी सहन करना होता है। उस दशा में अनुष्ठानों का वर्णन भी शास्त्रों में है। हमारे ऋषियों ने भी हरि अनन्त हरि कथा अनन्त कहा। उस अनन्त की कोई सीमा नहीं होती । जिसने जैसा देखा, वैसा लिखा। यह भी जोड़ दिया कि यह अंतिम सत्य नहीं है। युग दृष्टा तपस्वी इस दिशा में आगे बढ़ सकते है।
पितृ-पर्व स्मारिका को भी ऐसे ही प्रयासों में शामिल किया किया जा सकता है। प्रायः स्मारिका संबंधित विषय वस्तु की जानकारी देने के लिए प्रकाशित की जाती है। लेकिन पितृ-पर्व के संपादक पी एन द्विवेदी ने अभिनव प्रयोग किया। इसमें व्यक्तिव के साथ ही दर्शन और चिंतन का भी समावेश किया है। उन्होंने अपने पिता पंडित शेष नारायण द्विवेदी शास्त्री जी की स्मृति में प्रकाशित स्मारिका का संपादन किया। उनके विषय में पर्याप्त जानकारी दी गई। वह विख्यात सन्त प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के शिष्य और सहयोगी थे। पारिवारिक दायित्वों के निर्वाह के साथ ही उन्होंने समाज और आध्यात्म के प्रति अपने को समर्पित कर दिया था। यह उनके आचरण का ही प्रभाव था कि फूलपुर में लोग इन्हें भी ब्रह्मचारी जी के नाम से पुकारते थे।
पितृ-पर्व में विद्वान लेखकों के विचारों को स्थान दिया गया। प्रारंभ में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सन्देश है। इसके बाद संपादक ने अपने माता पिता के प्रति श्रृद्धा सुमन अर्पित किए है-‘अनुव्रत पितुः पुत्रो माता भवतु सन्मनः’। वह तैत्तिरीय उपनिषद के पितृदेवो भव उद्घोष से बात शुरू करते है। इसके बाद अपने पिता के श्राद्ध कर्म का विवरण दिया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष और प्रतिष्ठित लेखक हृदयनारायण दीक्षित ने माता पिता को यथार्थ देवता के रूप में चित्रित किया। लिखा कि पिता आशा,उत्साह, जिजीवीषा और गहन जीवन ऊर्जा से जोड़ता है। माता पिता से हमारी गति है। हमारी प्रकृति भी उन्हीं का विस्तार है। प्रत्यक्ष रूप में उनसे भौगोलिक दूरी हो सकती है लेकिन वस्तुतः वे प्रतिपल साथ ही होते है।
भारतीय विद्या भवन इलाहाबाद के निदेशक डॉ राम नरेश त्रिपाठी ने माता-पितरौ बन्दे में श्राद्ध कर्म की शास्त्रीय विवेचना की है। लखनऊ विश्व विद्यालय में संस्कृत के पूर्व विभागाध्यक्ष और वर्तमान में राष्ट्रधर्म के संपादक प्रो ओम प्रकाश पांडेय ने पितृदेवो भव को शास्त्रों के आधार पर प्रमाणित किया। माता का स्थान धरती के समकक्ष है और पिता का आकाश के तुल्य। वेदों में इसके लिए मंत्रों की रचना की गई। डॉ अनिल कुमार पाठक ने लिखा कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन हमारा कर्तव्य है। दिनेश कुमार गर्ग के अनुसार पिता एक सार्वभौमिक संबन्ध बोधक शब्द है। इस भाव को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए। सच्चिदानन्द द्विवेदी ने अपने भाई शास्त्री जी को लेख के माध्यम से अश्रुपूरित श्रद्धाजंलि जी है। राजेश तिवारी ने मातृशक्ति की चर्चा की। शास्त्रों के आधार पर बताया कि महिलाएं भी कर सकती है श्राद्ध। सेवा और अनुष्ठान दोनों का महत्व होता है। कुमार स्वामी फाउंडेशन लखनऊ के सचिव डॉ बृजेन्द्र पांडेय ने ऋणत्रय और कृतिज्ञता बोध का शोधपरक विवरण प्रस्तुत किया है। अनिल कुमार ने सनातन परंपरा के रूप में बताया कि राम ने चित्रकूट में किया था दशरथ का पिंडदान।
पितृ-पर्व में सन्तवचनामृत का विशेष उल्लेख है। इसमें पूरी पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य श्री स्वामी अधोक्षनन्द देवतीर्थ, काशिसुमेरु के स्वामी नरेंद्रानन्द सरस्वती,कैवल्यधाम पीठाधीश्वर स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी, आद्या प्रसाद ब्रह्मचारी, आचार्य प्रदीप तिवारी के का ज्ञानप्रद आशीर्वचन है। इन्हीं विभूतियों ने ग्राम दलपतपुर , फूलपुर ,प्रयाग में इस स्मारिका का वीमोचन किया था। राकेश शुक्ला के पितृपूजा और प्रभुदत्त ब्रह्मचारी पर मधुकर त्रिपाठी के लेख भी शोधपरक हैं। शास्त्री जी के पौत्र हर्षप्रिय और सत्यप्रिय द्वारा प्रस्तुत संस्मरण रोचक है। जितेंद्र पांडेय, बृजनन्दन यादव और विवेक त्रिपाठी ने कम शब्दों में सारगर्भित बात रखी है। स्मारिका का समापन पी एन द्विवेदी की मार्मिक कविता से हुआ है। स्मारिका का संपादन, सामग्री, प्रकाशन सभी उच्च स्तरीय है। इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करना उचित होगा। वर्तमान पीढ़ी तक यह चिंतन पहुंचना चाहिए।







