कवि रामानुज त्रिपाठी की पुण्यतिथि पर पुस्तक लोकार्पण,सम्मान समारोह एवं बालसाहित्य और नवगीतों पर चर्चा का आयोजन
सुलतानपुर 09 जुलाई। रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान गरये,सुलतानपुर उप्र की ओर से रामानुज त्रिपाठी की 15वीं पुण्य तिथि पर 08 जुलाई 2018 को ‘क्षत्रिय भवन सभागार’ में पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकार सम्मान समारोह , साहित्यिक संगोष्ठी व कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर तीन सत्रों में चले समारोह के प्रथम सत्र के कार्यक्रम में रामानुज त्रिपाठी की स्मृति में गीतकार रमाकांत सिंह को गीत साहित्य सम्मान, कविताकोश के सम्पादक राहुल शिवाय को नवगीत साहित्य सम्मान, रविशंकर मिश्र को गीत साहित्य सम्मान तथा आलम आजाद को हिंदी साहित्य सम्मान से अंगवस्त्रम एवं प्रतीक चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।
इसके बाद फतेहपुर की गीतकवयित्री छाया त्रिपाठी ओझा के गीत संग्रह ‘अक्षर-अक्षर गीत’ एवं डाॅ शोभनाथ शुक्ल द्वारा संपादित पत्रिका कथा समवेत के नवीन अंक का लोकार्पण आचार्य ओम नीरव,रमाकांत सिंह,राहुल शिवाय,धीरज श्रीवास्तव, डॉ शोभनाथ शुक्ल,डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येन्दु, उमाकांत पाण्डेय और संस्था के अध्यक्ष अवनीश त्रिपाठी द्वारा किया गया। अक्षर अक्षर गीत संग्रह पर गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए आचार्य ओम नीरव ने कहा कि ‘छाया त्रिपाठी ओझा के गीतों में गीत विधा का शिल्प और भाव पक्ष अपने उत्कर्ष पर मौजूद है।अक्षर अक्षर गीत के गीतों को देखकर लगता है कि उन्होंने इन गीतों को केवल लिखा ही नहीं है, अपितु जिया भी है।’
इसी क्रम में ‘अभिदेशक’ पत्रिका के संपादक डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी ने कहा कि “हृदय की घनीभूत पीड़ा,मन की एकाग्रता में बंधकर जब भाषा में ढलती है,तो गीत बन जाती है।इस भावभूमि पर छाया त्रिपाठी ओझा के गीत बड़े मार्मिक और प्रभावकारी बन पड़े हैं।कोमल कल्पनाओं एवं सम्वेदनाओं की सफल प्रस्तुति की गई है।” इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कविताकोश के संपादक नवगीतकार राहुल शिवाय ने रामानुज त्रिपाठी के नवगीतों में व्याप्त बिम्बों और प्रतीकों के अनूठे प्रयोग को इंगित करते हुए,छाया त्रिपाठी के गीतों की समीक्षात्मक टिप्पणी प्रस्तुत किया। इसके पश्चात परिचर्चा के केंद्र में रामानुज त्रिपाठी के नवगीत संग्रह ‘धुएँ की टहनियाँ’ पर समीक्षात्मक व्याख्यान देते हुए शुभम श्रीवास्तव ओम ने इस संग्रह में छपे हुए गीतों को प्रतिबिम्बों की वसीयत मानते हुए कहा “आज किसी भी कृति का आकलन करते हुए यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि कृतिकार ने अपने समकाल को कितना शब्दायित किया है।
‘धुएँ की टहनियाँ’ में व्यक्त ‘धुआँ’ निराशा या विषाद का प्रस्तुतिकरण नहीं अपितु उस क्रांति का उद्घोषक है जिसमें रचनाकार की समस्त परिवर्तनकामी इच्छाएँ निहित हैं।” अगले वक्ता के रूप में आलोचक उत्कर्ष सिंह ने रामानुज त्रिपाठी के नवगीतों में ऐतिहासिक और राजनैतिक पक्षों के साथ साथ भूख-प्यास, सामाजिक और सामासिक विसंगतियों के विषय मे विस्तृत व्याख्यान दिया।सत्र के अंतिम वक्तव्य के रूप में कथाकार चित्रेश के कहानी संग्रह ‘अंधेरे के बीच’ पर समीक्षात्मक व्याख्यान देते हुए आलोचक डॉ0 रामप्यारे प्रजापति ने कहा “यह कहानी संग्रह ग्रामीण पृष्ठभूमि और लोक की परिवीक्षा करता है तो साथ ही ग्रामीण परिवेश में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असन्तुलन को भी उद्घाटित करता है।” अध्यक्षता करते हुए गीतकार रमाकांत सिंह ने कहा कि “कवि रामानुज त्रिपाठी की प्रत्येक पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।इसे यदि सारस्वत श्राद्ध कहें तो गलत नहीं है।’
दूसरे सत्र में बालकवि रामानुज त्रिपाठी की स्मृति में बालपत्रिका ‘लल्लू जगधर’ के सम्पादक प्रेमचन्द्र गुप्त विशाल, अरविन्द कुमार साहू, योगेन्द्र मौर्य को अंगवस्त्रम एवं सम्मानपत्र प्रदान करके ‘बाल साहित्य सम्मान’ से सम्मानित किया गया।इसके पश्चात रामानुज त्रिपाठी के बालकविता संग्रह ‘जंगल का स्कूल’ पर समीक्षात्मक व्याख्यान में बन्धु कुशावर्ती ने कहा “रामानुज त्रिपाठी की कविताएँ प्राकृतिक,बालमनोवैज्ञानिक एवं बचपन के समाज को जीने वाली कविताएँ हैं।वे सीधे अपनी बात कहते हुए बच्चों के मन मे समा जाती है।” इसके पश्चात ‘बाल साहित्य पत्रकारिता एवं वर्तमान बाल साहित्य की दशा’ विषय पर परिचर्चा हुई।
‘बालसाहित्य पत्रकारिता’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए अरविंद कुमार साहू ने कहा कि “बालसाहित्य पत्रकारिता का विषय बहुत विशाल व उद्देश्यपूर्ण है।लेकिन बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये इसे भी वर्गीकृत किया जाना आवश्यक है।बाल पत्रकारिता,बालसाहित्य पत्रकारिता,बाल सूचनात्मक साहित्य,बाल रचनाकारों व बाल साहित्यकारों की गतिविधियाँ को वर्गीकृत करके विस्तार दिया जाना चाहिये। इसके बाल समाचार पत्रों की अवधारणों पर बल दिया जाना चाहिये। क्योंकि सीमित उद्देश्यों के लिये प्रकाशित होने वाली अधिकाँश बाल पत्रिकाएं इसे समग्र रूप में प्रस्तुत नही कर सकती।दशकों पहले से नंदन पत्रिका में आने वाला चार पृष्ठों का “बच्चों का अखबार” इसका सुंदर और उल्लेखनीय उदाहरण है। बच्चों की जिग्यासा ,कल्पना और साहसिक जिजीविषा के साथ ही बालसाहित्य के स्वरूप , उसके विविधीकरण व इतिहास पर अलग – अलग कार्य अधिक उपयोगी रहेगा।” आलोचक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह ‘रवि’ ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि “टी.वी.और इंटरनेट ने बच्चों की शारीरिक क्षमता का ह्रास किया है ।
आज बाजार में बाल साहित्य की मांग बढ़ी है इसलिये इसमें गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना होगा”। अध्यक्षता करते हुए आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप ने बाल साहित्य की उपेक्षा पर चिंता भी जताई और कहा कि “बाल साहित्य युवाओं के लिए बौद्धिक उर्जा प्रदान करता है।” इस सत्र के अंत में नवोदित बालकवयित्री साक्षी शुक्ला ने ‘चारों ओर छा रहे बादल, घिर घिर तड़प रहे हैं बादल’ बालकविता का पाठ किया। अन्तिम सत्र में कवियों और गीतकारों ने अपने गीत,कविता और शायरी प्रस्तुत कर लोगों को मंत्रमुग्ध किया। प्रथम सत्र का व्यवस्थित और उत्कृष्ट संचालन कथासमवेत पत्रिका के संपादक डा. शोभनाथ शुक्ल ने, दूसरे का युवा आलोचक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि ने एवं तीसरे का आशुकवि मथुरा प्रसाद सिंह जटायु ने किया।
अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए संस्था के अध्यक्ष और कार्यक्रम के आयोजक अवनीश त्रिपाठी ने कहा “किसी भी साहित्यकार की साहित्यिक विरासत को संभालना केवल उसके परिवार का दायित्व नहीं बल्कि सम्पूर्ण साहित्यजगत का है।इस दायित्व के निर्वहन में सहयोगी और कार्यक्रम में उपस्थित समस्त लेखक, रचनाकार एवं श्रोता बाबूजी की पुण्यतिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए धन्यवाद के पात्र हैं। इस अवसर पर साहित्यकार डॉ कैलाशनाथ मिश्र, कथाकार वीरेंद्र त्रिपाठी, साहिल मिश्रा, व्यंग्यकार हनुमान मिश्र, आलोचक सुरेश चन्द्र शर्मा, हरगोविन्द सिंह, देव नारायण शर्मा, डॉ करूणेश भट्ट, संगीता शुक्ला, प्रिया मिश्रा,दिलीप सिंह, शैलेन्द्र तिवारी, दयाराम अटल,तालुकदार सिंह,इकबाल भारती,यतीन्द्र प्रताप शाही, अब्दुल मन्नान, ओम प्रकाश सिंह, देवेंद्र सिंह, राम शरण मिश्र, शैलेश पाल, कुंवर सुल्तानपुरी, समाजसेवी करतार केशव यादव और डॉ0 लक्ष्मण गांधी, सत्य प्रकाश गुप्ता,प्रीति तिवारी और पिंकी त्रिपाठी,अब्दुल रहमान आदि विशेष रूप से उपस्थित रहे।







