शिराओं में समय की, जो लहू बनकर मचलता है।
विचारों का यही दरिया ज़माने को बदलता है।
हवाओं को हिरासत में, लिया करती हैं ये ग़ज़लें,
तभी उम्मीद का दीपक यहाँ बे-खौफ जलता है।
ग़रीबी चैन से जीने नहीं देती गरीबों को,
यही गाली पचाकर आदमी शोला उगलता है।
उजाले को सुबूतों की कहाँ दरकार होती है,
ये दुनिया जान लेती है जहाँ सूरज निकलता है।
नया इतिहास स्वर्णिम जो लिखे भावुक पसीने से,
उसी का नाम जीवन है, वही केवल सफलता है।
-भावुक







