‘मैं औरत हूँ’ इसलिए कभी नहीं थकती
मैं सबके जागने से पहले जागती हूँ
मैं सबके सोने के बाद सोती हूँ
क्योंकि मैं एक “औरत” हूँ
इसलिए कभी नहीं थकती
सुबह गृहस्थी में सिमट जाती है
दोपहर फाइलों के बण्डल में
शाम कुछ टीवी चैनल पर
रात उम्मीदों के जंगल में
देर रात चुपचाप चोरी सी
कुछ गाती हूँ गुनगुनाती हूँ
बिना पढ़े नींद कहाँ आती है
बिना लिखे सो भी कहाँ पाती हूँ
आधी रात जाग -जाग कर भी
बच्चों को कम्बल उढाती हूँ
उसी किसी रात के प्यारे पहर में
पति को भी अपना बनाती हूँ
सिमट जाती है सारी “दुनिया” मुझ में…
कभी “मैं” दुनिया में बिखर जाती हूँ
अपने आँसू छुपा के आँखों में
सारी आँखों का ग़म उठाती हूँ
रोज़ बुनती हूँ नए फ़लसफ़े
रोज़ चुनौतियों से लड़ा करती हूँ
रोज़ करती हूँ खुद से मोहब्बत
रोज़ खुद को तलाक दिया करती हूँ
सुर्ख सिन्धूरी सपनों सी रंगत मेरी
“रोली” हूँ भाल सजाती हूँ कभी नहीं मिटती
“मैं औरत हूँ” इसलिए कभी नहीं थकती…..
– कामिनी शर्मा







