अव्वल तो दुनिया में अश्लील कुछ भी नहीं। प्लेबॉय से लेकर पोर्न तक। मगर मनुष्य बड़ा चालक है, अपने काम भर को हर किसी में कथित अश्लीलता खोज ही लेता है।
उसके बाद पूरी दुनिया को अश्लीलता पर तरह-तरह के पाठ पढ़ाता है। जबकि वो पाठ कम कु-पाठ ही अधिक होते हैं। मसलन- उसे सुष्मिता सेन की कमर से लेकर जैकलीन के होठों तक में अश्लीलता के दर्शन हो जाते हैं।
अश्लीलताएं बड़ी तिकड़मी होती हैं। जोड़-जुगाड़ से अपने लिए रास्ता बना ही लेती हैं। हम दरअसल उन्हीं जुगाड़ के रास्तों पर चलने को अभिशप्त हैं।
खुशवंत सिंह या सहादत हसन मंटो जैसा खुले दिलो-दिमाग का कोई लेखक जब कथित अश्लीलताओं की चोली उतारता है तो उन्हें बदनाम या गंदा लेखक करार दिया जाता है।
ये दुनिया और मनुष्य आले दर्जे के पागल हैं। खुद अश्लील होते हुए अश्लीलता को गरियाते हैं। हे! राम।
-अंशु माली रस्तोगी







