अपनत्व के दावे
चाँद तारे तोड़ कर लाने
और जान की बाजी लगाने
के वादे।
बहारों के मौसम में
मन को है बहलाते।
लेकिन पतझड़ में
अलग होने लगते है
साथ देने वाले
बन जाते है बेगाने
बेरुखी की बातें
दूर हो जाती है गलतफहमी
खुल जाती है आंखे।
न जाने कहाँ गुम हो जाते है
बुलंद इरादे।।
– दिलीप अग्निहोत्री







