देश-दुनिया की ख़बर रखने लगे।
पाँव में हम भी सफ़र रखने लगे।
रास्ते तो ख़ुद -ब-ख़ुद बनते गये,
पाँव अपने जिस डगर रखने लगे।
साँप भी ये देखकर हैरान है,
आदमी इतना! ज़हर रखने लगे।
प्यास खेतों की उन्हें मालूम क्या,
कागज़ों में जो नहर रखने लगे।
आज तूने मान ली, तो यूं लगा-
बात में हम भी असर रखने लगे।
- कमल किशोर ‘भावुक’







