भाजपा सरकार ने तीन तलाक़ पर कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को साथ बड़ा काम किया है समाज में ऐसी बहुत सी पीड़ित महिलाएं है जो तीन तलाक़ के कारण गुमनामी की ज़िंदगी जी रहीं हैं और जिनके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं और वे अपने बच्चों और नौनिहालों के भविष्य को लेकर बेहद चिंतित हैं कि क्या उनके साथ कभी तीन तलाक़ जैसे गंभीर मुद्दे पर विचार होगा। इस गंभीर मसले को भाजपा ने गंभीरता से समझा और इस कुरीति को जड़ से ख़त्म करने के लिए बड़ा बीड़ा उठाया।
वैसे तो भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक पर अध्यादेश लाना पहले से तय था। जिस तरह सरकार तीन तलाक के विरुद्ध कानून बनाने के प्रति अडिग थी उसमें यही चारा बचा था। लोक सभा में पारित होने के बावजूद राज्यसभा में रुक जाने के बाद सरकार के पास अध्यादेश का ही विकल्प बचता है। अच्छा होता कि यह संसद में पारित हो जाता। तीन तलाक का जैसा दुरूपयोग हो रहा है, उसे न रोकने का अर्थ है, कानून के राज की अस्वीकृति। महिलाओं के साथ अन्याय हो और सरकार और समाज उसके साथ खड़ा नहीं हो, इस कुप्रथा को रोकने के लिए कदम नहीं उठाया जाए तो इसका अर्थ यही होगा कि हमारे अंदर मनुष्यता नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवैध करार दिए जाने के बावजूद मिनटों में तीन तलाक देकर महिलाओं को घर से बाहर निकालने की क्रूरता जारी है। पिछले साल जनवरी से 13 सितम्बर 2018 तक देश में तीन तलाक के 430 मामले संज्ञान में आए हैं। इनमें 229 मामले 22 अगस्त 2017 के उच्चतम न्यायालय के फैसले के पहले के हैं और 201 मामले फैसले के बाद के हैं। साफ है वहशी मानसिकता वाले सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने को तैयार नहीं है। पीड़ित महिला जब थाने पहुंचती है तो थानेदार स्वयं को कानून के अभाव में लाचार पाता है।
अध्यादेश के बाद कम-से कम छह महीने के लिए तो कानून अस्तित्व में आ गया है। अब पत्नी को मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से तलाक देना गैरकानूनी होगा। तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। नाबालिग बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी पीड़िता को मिलेगी और पीड़िता और नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के लिए उसका पति मजिस्ट्रेट द्वारा तय पैसे देगा। हालांकि इसमें मजिस्ट्रेट को जमानत का अधिकार दे दिया गया है जो ठीक ही है। मजिस्ट्रेट को पति-पत्नी के बीच समझौता कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा। इस तरह यह काननू कठोर और उदार दोनों चरित्र लिये हुए है।
तलाक के बाद यदि मजिस्ट्रेट के समझाने से पति मान जाता है और पत्नी उसके साथ जाने को तैयार हो जाती है, इससे बेहतर बात कुछ हो नहीं सकती। पहले इसके लिए भी कोई तंत्र उपलब्ध नहीं था। हालांकि मुस्लिम समाज में तलाक हो जाने पर हलाला के बाद ही पूर्व पति के साथ निकाह की कुप्रथा है। इसे रोकने के लिए भी कानून बनाए जाने की जरूरत है ताकि अगर पति-पत्नी समझौता कर साथ आते हैं तो उनके सामने ऐसी कोई बाधा न रहे।








2 Comments
Des plus belles histoires et actualit?s qui buzzent.
I blog frequently and I really thank you for your content.
The article has really peaked my interest. I will bookmark your blog and
keep checking for new information about once per week. I subscribed
to your RSS feed as well.