Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Wednesday, October 28
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बच्चे विद्यार्थी नहीं, स्कूलों के ग्राहक हैं

    By November 29, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 582

    कवि और गीतकार गुलजार की पंक्तियां हैं- ‘जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है, अरे चड्ढी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है!’ हमारे जमाने का बचपन क्या मस्त था! न पीठ पर बस्ते का बोझ, न सबक का तनाव, न ट्यूशन की भागमभाग। मां-बाप सब कुछ भगवान या यों कहिए कि स्कूल के मास्टर साहब पर छोड़ देते थे। कुछ गलती की तो घर में आकर भी पिट जाते थे। लेकिन आज के मास्टर साहब बस सेवा उपलब्ध कराने वाले के रूप में हैं। बच्चे विद्यार्थी नहीं, ग्राहक। अभिभावकों को हर हाल में सौ फीसद रिजल्ट चाहिए, इससे नीचे नहीं। बच्चे इसी चक्कर में रोबोट बनते गए हैं। मौज-मस्ती, खेलकूद, शैतानी सब गायब। पैदा होते ही सीधे सयानों की तरह चुनौती। तब दो महीने की गरमी की और एक महीने की फसली छुट्टी होती थी। जो सबक हम स्कूलों में नहीं सीख पाते थे, वे इन छुट्टियों में सीखते थे।

    आम के बगीचों में लगने वाली पाठशाला में हम लोग वह सब दुनियादारी सीखते थे जो स्कूलों में नहीं सिखाई जाती। अच्छी और बुरी, दोनों। लेकिन निगरानी और संतुलन रखने के लिए कोई न कोई बड़ा भाई भी होता था। एक बार हम लोग बीड़ी पीते पकड़े गए। जम के पिटाई हुई। तब कोई दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। चूंकि गांव में रिश्ते के एक कक्कू बीड़ी पीते थे और नाक से धुआं निकालने का करतब दिखाते थे, इसलिए हमने भी चुपके से उनकी कट्टी से निकाला फिर कोशिश की। पिटाई के बाद पता चला कि ये बुरी बात है। बच्चों को क्या करना चाहिए, क्या नहीं, यह सब इन्हीं दिनों सीखते थे। तरह-तरह के खेलकूद, पैंतरे- सब कुछ बिना किसी कोच के सीखते थे। खेलकूद में जब कभी चोट लग जाए तो प्राथमिक उपचार होता था कि कोई उस चोट या कटी हुई जगह पर पेशाब कर दे। वहीं कोई घमिरा की पत्तियां पीस के लगा देता, कोई पट्टी बांध देता। नब्बे फीसद मामले हम लोग वहीं निपटा लेते थे।

    दरअसल, इन छोटे-छोटे कामों से जो साहस और आत्मनिर्भरता आती है, वह न तो घर में, न स्कूल में सिखाई जा सकती है। हम बच्चों के उड़ने के लिए सारा आकाश था और दौड़ने के लिए समूची धरती। शायद ही कोई विश्वास करे कि हम लोगों ने गांव के नालों में तैरना सीखा। जो उम्र में बड़े होते थे, वे खुद ही छोटों को वह सब सिखा दिया करते थे, जो वे सीख चुके होते थे। हमारे गांव के नाले से तैराकी शुरू करने वाले कई तो राष्ट्रीय खिलाड़ी हुए। एक दूसरी भी पाठशाला होती थी। घर में दादी की और ननिहाल में नानी की। कई व्यावहारिक ज्ञान, शिक्षाप्रद किस्से, गीत, कहावतें, धर्म, पाप-पुण्य की बातें यहां सीखने को मिलती थीं। यह ज्ञान की वाचिक परंपरा सदियों से चली आ रही है।

    किस्सों में सुना था कि फलां नदी का पुल नहीं बन रहा था तो वहां एक बलि दी गई, तब काम आगे बढ़ा। लेकिन आज हकीकत यह है कि विकास मनुष्यों की बलि चाहता है। विकास की इमारत शोषण की बुनियाद पर खड़ी दिखती है। जहां ज्यादा अमीरी हो, समझिए कहीं न कहीं उसी अनुपात में गरीबी होगी। देश की भौतिक तरक्की ने हमारे बचपन की बलि ली है। एक-एक करके हमने बचपन की चंचलता और चपलता को लिजलिजे स्वरूप में बदल दिया।

    बच्चों की चिंता करने वाले एक मित्र से मैंने कहा कि हमने बचपन से क्या-क्या छीन लिया है! वे पलट कर बोले- ‘ये कहिए कि हमने क्या नहीं छीना! हमने उनसे आंगन छीन लिया जो उनका पहला कुरुक्षेत्र होता था। संयुक्त परिवार बिखरे कि आंगन मर गया। हमने बचपन से चाची, ताई, बुआ की लोरी छीन ली, दादी मां के किस्से छीन लिए, नानी के नुस्खे हड़प लिए। हमने गरमी-फसली छुट्टी की वह आबो-हवा छीन ली। पारंपरिक खेल गायब किए। हमने समाज की साझी संस्कृति का सत्यानाश कर दिया। हमने उनसे बचपन का साहित्य और चपलता की लय को छीन लिया। विकास की गलाकाट दौड़ में बचपन को भी दौड़ा दिया कि सौ प्रतिशत के नीचे क्षम्य नहीं। बचपन की पीठ पर बोझ लाद दिया, फिर सीटी बजाई कि दौड़ो अब। बचपन को आकाश में उड़ने से पहले ही उसके पंख काट दिए। गुड्डे-गुड़िया छीन कर थमा दी प्लास्टिक की मशीनगन। एंड्रॉयड फोन थमा कर ज्ञान के बजाय दुनिया की सड़ांध का दरवाजा ही ज्यादा खोला। टीवी चैनलों की चीख-पुकार, धमकी के बीच उसके कोरे स्लेट से दिमाग को खोल के रख दिया।’

    विकास दर सिर्फ तरक्की की नहीं होती, विनाश और विकृति की भी होती है। इसे भी नापने का मीटर बनाइए। सब कुछ मुट्ठी से रेत की तरह फिसलता जा रहा है। वक्त की फिसलपट्टी से कोई एक बार फिसला कि गया। वह उठने लायक नहीं बचता। हम रफ्तार के साथ भाग रहे हैं। शर्त थी कि सब कुछ साथ रहेगा। इस आपाधापी में क्या-क्या नहीं छोड़ कर भागे जा रहे हम… उस बचपन को भी जो कभी चड्ढी पहन कर फूल की तरह खिला करता था।

    लेखकः जयराम शुक्ल

    Keep Reading

    नीले ड्रम’ हत्याकांड पर आया फैसला : जैसी करनी, वैसी भरनी

    अकीदा बनाम अंधविश्वास: पक्के विश्वास और भटकती भीड़ की दास्तान

    नालसा का एलएडीसी सिस्टम खत्म करने का फैसला: क्या गरीब कैदियों से छिन जाएगा न्याय का सहारा?

    Nepal Flood Tragedy: The Most Harrowing Incident of Devastation

    नेपाल बाढ़ त्रासदी: तबाही का सबसे दर्दनाक हादसा

    रक्षाबंधन: परंपरा, पहचान और बाजारवाद का संगम

    Trump Trapped in a Labyrinth: US President's Mounting Difficulties Amid the Maze of an Iran War

    चक्रव्यूह में फंसे ट्रंप: ईरान युद्ध की भूलभुलैया में अमेरिकी राष्ट्रपति की बढ़ती मुश्किलें

    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    Anuradha Paudwal: Reached great heights, yet also endured the pain of profound loneliness.

    अनुराधा पौडवाल : बुलंदियों को भी छुआ और गहरे अकेलेपन का दर्द भी झेला

    October 28, 2026

    यूपी में श्रमिकों की बढ़ी मजदूरी, महंगाई सूचकांक के आधार पर तय हुई दरें

    October 28, 2026
    Neeru Sharma Explores Parenting, Social Conditioning and Unspoken Wounds as the Trailer of Sonali Kulkarni’s ‘Like Maa’ Is Released

    माँ की परवरिश में छिपे बचपन के जख्मों की कहानी कहेगी ‘लाइक माँ’

    October 28, 2026
    U&i launches new gadgets: now listen to music and make calls for up to 50 hours—all through your glasses.

    U&i के नए गैजेट्स लॉन्च, अब चश्मे से सुनें म्यूजिक और 50 घंटे तक करें कॉलिंग

    October 28, 2026
    From Ravana on Screen to a Power Player Behind the Scenes! Yash Makes a Big Move in ‘Ramayana’ Distribution

    पर्दे पर रावण, पर्दे के पीछे पावरफुल खिलाड़ी ! ‘रामायण’ के डिस्ट्रीब्यूशन में यश की बड़ी एंट्री

    October 27, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading