कवि और गीतकार गुलजार की पंक्तियां हैं- ‘जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है, अरे चड्ढी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है!’ हमारे जमाने का बचपन क्या मस्त था! न पीठ पर बस्ते का बोझ, न सबक का तनाव, न ट्यूशन की भागमभाग। मां-बाप सब कुछ भगवान या यों कहिए कि स्कूल के मास्टर साहब पर छोड़ देते थे। कुछ गलती की तो घर में आकर भी पिट जाते थे। लेकिन आज के मास्टर साहब बस सेवा उपलब्ध कराने वाले के रूप में हैं। बच्चे विद्यार्थी नहीं, ग्राहक। अभिभावकों को हर हाल में सौ फीसद रिजल्ट चाहिए, इससे नीचे नहीं। बच्चे इसी चक्कर में रोबोट बनते गए हैं। मौज-मस्ती, खेलकूद, शैतानी सब गायब। पैदा होते ही सीधे सयानों की तरह चुनौती। तब दो महीने की गरमी की और एक महीने की फसली छुट्टी होती थी। जो सबक हम स्कूलों में नहीं सीख पाते थे, वे इन छुट्टियों में सीखते थे।
आम के बगीचों में लगने वाली पाठशाला में हम लोग वह सब दुनियादारी सीखते थे जो स्कूलों में नहीं सिखाई जाती। अच्छी और बुरी, दोनों। लेकिन निगरानी और संतुलन रखने के लिए कोई न कोई बड़ा भाई भी होता था। एक बार हम लोग बीड़ी पीते पकड़े गए। जम के पिटाई हुई। तब कोई दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। चूंकि गांव में रिश्ते के एक कक्कू बीड़ी पीते थे और नाक से धुआं निकालने का करतब दिखाते थे, इसलिए हमने भी चुपके से उनकी कट्टी से निकाला फिर कोशिश की। पिटाई के बाद पता चला कि ये बुरी बात है। बच्चों को क्या करना चाहिए, क्या नहीं, यह सब इन्हीं दिनों सीखते थे। तरह-तरह के खेलकूद, पैंतरे- सब कुछ बिना किसी कोच के सीखते थे। खेलकूद में जब कभी चोट लग जाए तो प्राथमिक उपचार होता था कि कोई उस चोट या कटी हुई जगह पर पेशाब कर दे। वहीं कोई घमिरा की पत्तियां पीस के लगा देता, कोई पट्टी बांध देता। नब्बे फीसद मामले हम लोग वहीं निपटा लेते थे।
दरअसल, इन छोटे-छोटे कामों से जो साहस और आत्मनिर्भरता आती है, वह न तो घर में, न स्कूल में सिखाई जा सकती है। हम बच्चों के उड़ने के लिए सारा आकाश था और दौड़ने के लिए समूची धरती। शायद ही कोई विश्वास करे कि हम लोगों ने गांव के नालों में तैरना सीखा। जो उम्र में बड़े होते थे, वे खुद ही छोटों को वह सब सिखा दिया करते थे, जो वे सीख चुके होते थे। हमारे गांव के नाले से तैराकी शुरू करने वाले कई तो राष्ट्रीय खिलाड़ी हुए। एक दूसरी भी पाठशाला होती थी। घर में दादी की और ननिहाल में नानी की। कई व्यावहारिक ज्ञान, शिक्षाप्रद किस्से, गीत, कहावतें, धर्म, पाप-पुण्य की बातें यहां सीखने को मिलती थीं। यह ज्ञान की वाचिक परंपरा सदियों से चली आ रही है।
किस्सों में सुना था कि फलां नदी का पुल नहीं बन रहा था तो वहां एक बलि दी गई, तब काम आगे बढ़ा। लेकिन आज हकीकत यह है कि विकास मनुष्यों की बलि चाहता है। विकास की इमारत शोषण की बुनियाद पर खड़ी दिखती है। जहां ज्यादा अमीरी हो, समझिए कहीं न कहीं उसी अनुपात में गरीबी होगी। देश की भौतिक तरक्की ने हमारे बचपन की बलि ली है। एक-एक करके हमने बचपन की चंचलता और चपलता को लिजलिजे स्वरूप में बदल दिया।
बच्चों की चिंता करने वाले एक मित्र से मैंने कहा कि हमने बचपन से क्या-क्या छीन लिया है! वे पलट कर बोले- ‘ये कहिए कि हमने क्या नहीं छीना! हमने उनसे आंगन छीन लिया जो उनका पहला कुरुक्षेत्र होता था। संयुक्त परिवार बिखरे कि आंगन मर गया। हमने बचपन से चाची, ताई, बुआ की लोरी छीन ली, दादी मां के किस्से छीन लिए, नानी के नुस्खे हड़प लिए। हमने गरमी-फसली छुट्टी की वह आबो-हवा छीन ली। पारंपरिक खेल गायब किए। हमने समाज की साझी संस्कृति का सत्यानाश कर दिया। हमने उनसे बचपन का साहित्य और चपलता की लय को छीन लिया। विकास की गलाकाट दौड़ में बचपन को भी दौड़ा दिया कि सौ प्रतिशत के नीचे क्षम्य नहीं। बचपन की पीठ पर बोझ लाद दिया, फिर सीटी बजाई कि दौड़ो अब। बचपन को आकाश में उड़ने से पहले ही उसके पंख काट दिए। गुड्डे-गुड़िया छीन कर थमा दी प्लास्टिक की मशीनगन। एंड्रॉयड फोन थमा कर ज्ञान के बजाय दुनिया की सड़ांध का दरवाजा ही ज्यादा खोला। टीवी चैनलों की चीख-पुकार, धमकी के बीच उसके कोरे स्लेट से दिमाग को खोल के रख दिया।’
विकास दर सिर्फ तरक्की की नहीं होती, विनाश और विकृति की भी होती है। इसे भी नापने का मीटर बनाइए। सब कुछ मुट्ठी से रेत की तरह फिसलता जा रहा है। वक्त की फिसलपट्टी से कोई एक बार फिसला कि गया। वह उठने लायक नहीं बचता। हम रफ्तार के साथ भाग रहे हैं। शर्त थी कि सब कुछ साथ रहेगा। इस आपाधापी में क्या-क्या नहीं छोड़ कर भागे जा रहे हम… उस बचपन को भी जो कभी चड्ढी पहन कर फूल की तरह खिला करता था।
लेखकः जयराम शुक्ल







