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    Home»ब्लॉग

    गरीब अखबार मालिकों का दर्द

    By September 28, 2018 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    • “महिलाओं को आजादी ‘गे’ के साथ इंसाफ, फिर हमसे काहे इतनी पूछताछ”
    • फुटपाथ पर सो जाता है अखबार बिछा कर, मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाता
    • ईमानदार पत्रकारों की गरीबी तो आम बात है, दैनिक अखबारों के मालिकों की भी हैसियत मजदूरों जैसी है। अखबारों का काबा और काशी कहे जाने वाले नयी दिल्ली स्थित डीएवीपी कार्यालय के बाहर जमीन पर रात गुजार रहे हैं गरीब पब्लिशर्स।
    जो मंजर नजर आया:
    समय : सुबह के 6 बजकर आठ मिनट
    स्थान : नई दिल्ली स्थित डीएवीपी आफिस में रिसिविंग विन्डोज के बाहर का ग्राउंड।
    फोटो फ्रेम में जो लाइन में लगी गठरियां दिख रहीं हैं इसमें अखबार हैं और अखबारों से जुड़े जरूरी कागज़ात हैं।
     कैमरे ने गठरियां/बोरे/झोले ही नही देखे, इसके इर्द गिर्द जमीन.. पत्थरों  पर आड़े-तिरछे पड़े सो रहे लोगो को भी देखा। लेकिन उनकी तस्वीरें दिखाना मुनासिब नहीं है।
    देशभर के दूर दराज के राज्यों से थके मारे जमीन पर सो रहे ये कौन लोग थे?
    इनमें से ज्यादातर लोग अखबारों के मालिक थे।
    भारत सरकार के मान्यता प्राप्त किसी दैनिक अखबार के मालिक का तसव्वुर आते ही हमारी आंखों के सामने सूटबूट वाला साहब आ जाता है। कुछ पब्लिशर बड़ी हैसियतदार होते भी हैं। लेकिन ज्यादातर अखबारों के पब्लिशर /मालिक मजदूरों से बदतर हैसियत वाली कष्टकारी जिन्दगी जी रहे हैं। यकीन ना हो तो दो-चार दिन के अंदर दिल्ली स्थित डीएवीपी आफिस का मंजर देख लीजिए।
    दरअसल देशभर के अखबारों की डीएवीपी मान्यता समाप्त हो रही है। इसलिए सभी अखबारों का रिनीवल होना है।सुबह नौ बजे विन्डोज खुलते ही भीड़ का हुजूम लग जाता है इसलिए कुछ पब्लिशर रात को ही खिड़की के बाहर अखबारों और जरूरी दस्तावेजों की गठरी की लाइन लगाकर इधर उधर जमीन पर सो जाते है। सुबह  नौ बजे जब खिड़की खुलती है तो ये रिनीवल के लिए मांगे गये अखबार और तमाम दस्तावेज जल्द जमा करने का सौभाग्य प्राप्त कर लेते है।
     अस्ल में बहुत सारे ऐसे गरीब पब्लिशर हैं जिनके पास मुनाफे के तौर पर इतना नहीं बचता कि वो एक चपरासी भी रख लें। मालिक, पब्लिशर, मुद्रक, संपादक, ब्यूरो प्रमुख, संवाददाता, छायाकार, सब एडीटर, आपरेटर, एकाउंटेंट यहां तक की चपरासी और बाइंडर का काम भी खुद करते हैं। डीएवीपी में रिनीवल से लेकर किसी भी जरूरी काम के लिए जब इन्हें दिल्ली आना होता है तो ज्यादातर गरीब पब्लिशर कागजों की गठरियां /झोले लेकर खुद आते हैं। और वो भी कुछ इस तरह आते हैं कि उन्हें दिल्ली में होटल ना लेना पड़े। ट्रेनों या बसों से ये सीधे डीएवीपी आफिस आते हैं। आफिस खुलने के इंतजार में रात बितानी हो तो जमीन पर सो जाते है। और फिर अपना काम करके सीधे रेलवे या बस स्टेशन की तरफ प्रस्तान करते हैं।
    देश के कुल अखबारों में 95% अखबार  साधनहीन और संघर्षरत अखबार हैं। इन 95% छोटे अखबारों के पब्लिशर्स में  पांच या बहुत से बहुत दस% प्रतिशत ऐसे हो सकते है जिन्होंने खूब फर्जी प्रसार शो करके ले दे कर खूब सरकारी विज्ञापन हासिल किये और वो करोड़ पति बन गये। लेकिन इनमें से ज्यादातर प्रकाशकों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।
    ये बड़ी मुश्किलों से नियमित अखबार छापते हैं और डीएवीपी द्वारा समय-समय पर मांगे गये कागजात और हिसाब-किताब देकर अपने अखबार की विज्ञापन दरों की मान्यता बचा पाते हैं। बस इनको इतना सरकारी विज्ञापन मिलता है कि अखबार छपने के खर्च के अलावा दस-बीस हजार बच जाये। जिससे रूखी-सूखी रोटी का इंतजाम हो और किसी तरह घर चल सके।
    ये सारी बातें डीएवीपी कैंपस में लगी भीड़ से दरयाफ्त होती हैं। यहां अखबारों के रिनीवल के लिये लगी तीन कतारों में एक वक्त में तीन-चार सौ लोगों की भीड़ थी। ये सिलसिला कई दिनों से जारी है। देशभर के अखबार रिनीवल के लिए कागजात जमा कर रहे हैं इसलिए देश के कोने कोने से आने वालों का हुजूम लगा हैं।
    अखबार की गरिमा और झोले लिए कतार में लगे सैकड़ों लोगों में से कुछ से बातचीत से अंदाजा लगाया जा सका कि इनमें से ज्यादातर लोग अखबार के मालिक हैं।
    चार लोगों से दिलचस्प बातचीत हुई। यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश और दिल्ली के पब्लिशर्स  अखबारों को लेकर सरकार की सख्त पालिसी से खासे नाराज़ दिखे।
    बचरावां (यूपी)के शिव, सासाराम(बिहार) के वीर, मध्य प्रदेश के नवेद और दिल्ली के मलिक ने छोटे अखबारों पर सख्ती, विज्ञापन नीति और न्यूज प्रिंट पर जीएसटी को लेकर सरकार के सामने सवाल खड़े किये। और कुछ सुझाव भी दिये। एक पब्लिशर न्यायालय के हालिया फैसलों का स्वागत करते हुए कहते हैं- गे के शारिरिक संबंध वैध हो गये। मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति मिली। पत्नियां गैर मर्द से शारीरिक संबंध स्थापित करें तो कोई हर्ज नहीं हम बिना सरकारी मदद के भी ज्यादा अखबार निकालें तो फ्राॅड। हर तरफ आजादी का जश्न है।  पर छोटे अखबार वाले नयी-नयी सख्तियों के बंधन में क़ैद किये जा रहा हैं।
     दूसरा पब्लिशर कहता है- हो सकता है चंद छोटे पब्लिशर झूठे प्रसार और सरकारी विभागों की रिश्वत की सीढ़ियों से करोड़ों रुपये के सरकारी विज्ञापन हासिल करके दौलत के महल खड़े करने में कामयाब हो गये हों लेकिन 95%छोटे अखबारों की महीने में  दस-पंद्रह हजार  रूपये से ज्यादा आमदनी नहीं है। जो चपरासी और मजदूर की आमदनी से भी कम है। बेबसी से कहते हैं- पता होता कि अखबारों के पब्लिशर्स की ये दशा होगी तो मनरेगा का मजदूर बन जाता। कम से कम बीपीएल कार्ड की सरकारी सुविधायें तो मिल जातीं।
    इस बीच एक अखबार मालिक बोला- अखबारों के मालिकों पर सख्तियां इसलिए ही तो बढ़ रही हैं क्योंकि डर है कि फर्जी और झूठे प्रसार वाले  अखबार सरकारी विज्ञापन दरों की मान्यता के सहारे सरकारी  विज्ञापनों की सेंधमारी ना करे। इसके लिए सरकार से मेरा एक सुझाव है- जिस छोटे-बड़े अखबारों ने जितनी ज्यादा रकम का सरकारी विज्ञापन लिया उसकी ही उतनी जांच-पड़ताल हो। उन्हीं से कागज की खरीद का हिसाब भी पूछा जाये जिनकी सरकारी विज्ञापनों की बिलिंग सालाना दस लाख से दस करोड़ तक है। जिन दैनिक अखबारों को सरकार पांच हजार रुपये महीना एवरेज का विज्ञापन भी नहीं देती है उनसे पाई-पाई का हिसाब पूछने का क्या हक है !!
    लाइन में लगेंगे.. बात करते-करते इन पब्लिशर्स का भी नंबर आ गया और बात खत्म हो गई।
    अभी भी तमाम और पब्लिशर्स से बात करनी की जिज्ञासा सी। लेकिन ज्यादातर लोग भूख-प्यास और धूप से हलकान हो चुके थे। उनसे बात करना मुनासिब नहीं था। लाइन में लगे सुबह से शाम हो चुकी थी। भूख-प्यास और धूप की शिद्दत सब को सता रही थी। मुझे इस बात का पूरा अहसान था, क्योंकि मैं खुद भी इस लाइन मे था।
    – नवेद शिकोह

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