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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    गोमती का डूबता भविष्य: वह पवित्रता अब कहाँ?

    ShagunBy ShagunJune 26, 2026 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    हाल -ए – गोमती नदी का : देवेश पांडेय 

    गोमती, जिसे लाखों लोग आदि माँ के रूप में पूजते हैं, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। करीब 940 किलोमीटर लंबी यह नदी, जो कभी पूरे अवध क्षेत्र को जीवन और समृद्धि देती थी, अब कई हिस्सों में नाले में बदल चुकी है। जलग्रहण क्षेत्र का सिकुड़ना, वेटलैंड्स का विनाश और बेलगाम अतिक्रमण – ये सब मिलकर गोमती को मौत की नींद की ओर धकेल रहे हैं।

    हाल के अध्ययनों के अनुसार, नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र में करीब 120 स्थानों पर अतिक्रमण हो चुका है। सबसे गंभीर स्थिति लखनऊ में है, जहाँ 41 प्रमुख रुकावटें दर्ज की गई हैं। नदी का प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र भी अवैध कब्जों की भेंट चढ़ गया है। गोमतीनगर जैसी पॉश कॉलोनियाँ पुराने बाढ़ क्षेत्र पर बसी हुई हैं, जिसके कारण नदी की चौड़ाई और प्रवाह क्षेत्र कई जगहों पर 100 मीटर तक कम हो चुका है।

    और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि गोमती की कुल 26 सहायक नदियों में से 22 पूरी तरह सूख चुकी हैं, जबकि शेष में भी नाममात्र का बहाव बचा है। लखनऊ में नदी के कुल प्रवाह का 76 प्रतिशत हिस्सा भूजल पर निर्भर है। लेकिन अनियंत्रित दोहन के कारण भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे नदी का प्राकृतिक पोषण लगभग खत्म हो चुका है।

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    विकास के नाम पर हुई सुंदरीकरण परियोजनाएँ और अन्य निर्माण कार्य भी नदी के लिए अभिशाप साबित हुए हैं। वेटलैंड्स और नदी के एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले तालाबों की उपेक्षा ने वर्षा जल संचयन की प्राकृतिक व्यवस्था को चरमरा दिया है।

    सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गोमती के संरक्षण और पुनरुद्धार के नाम पर पिछले दस वर्षों में दो हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की जा चुकी है, लेकिन नतीजे उलटे ही निकले हैं। हालात पहले से भी बदतर हो गए हैं। फंड की बर्बादी, योजनाओं का कागजी अस्तित्व और अतिक्रमण पर नकेल न कस पाना – सरकारी प्रयासों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।

    समय अब जागने का है।
    गोमती सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय पहचान है। यदि हम अभी भी अतिक्रमण हटाने, वेटलैंड्स को पुनर्जीवित करने, भूजल संरक्षण और सहायक नदियों को बहाल करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ गोमती को सिर्फ किताबों और यादों में ही देख पाएंगी।

    सरकार, प्रशासन, नागरिक समाज और विशेषज्ञों को मिलकर एक व्यापक, पारदर्शी और समयबद्ध कार्ययोजना बनानी होगी। कागजी योजनाएँ और फोटो-ओप्स अब काम नहीं करेंगे। गोमती को बचाना है तो सच्ची इच्छाशक्ति, सख्त कानूनी कार्रवाई और सतत निगरानी जरूरी है।

    पवित्र नदी को नाले में बदलने की यह सिलसिला अब रोकना होगा- वरना हम अपनी सभ्यता की एक जीवित धरोहर को हमेशा के लिए खो देंगे।

    Shagun

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