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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बेगानी हुई बंगलुरू की विपक्षी बयार

    By October 4, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    बंगलुरू में मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह विपक्ष के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। विपक्ष का शायद ही कोई बड़ा नेता ऐसा रहा हो, जिसने वहां अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई हो। जिनको कर्नाटक में कोई ठीक से जानता पहचानता नहीं था, वह भी विजेता भाव के प्रदर्शन में पीछे नहीं थे। ऐसा लग रहा था जैसे विपक्ष का महागठबन्धन आकर ले चुका है।
    लेकिन धीरे धीरे यह तस्वीर धुंधली पड़ने लगी। सबसे पहले वही मंच से फफक फफक कर रोये थे, जिसके शपथ ग्रहण के उपलक्ष्य में उत्सव हुआ था। विपक्षी नेताओं के पैर बंगलुरू की जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।कुमारस्वामी का कहना था कि कांग्रेस के दबाब से वह आजिज हुए जा रहे है।
    कुमारस्वामी के रोने के बाद से महागठबन्धन पर ग्रहण लग गया था। ममता बनर्जी, शरद पवार, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव ने साफ कर दिया कि प्रधानमंत्री का नाम आमचुनाव के बाद तय होगा। इसका साफ मतलब था कि इनको कांग्रेस के नेतृत्व में चुनाव लड़ना मंजूर नहीं है। रही सही कसर बसपा प्रमुख मायावती ने पूरी कर दी। बंगलुरू के विपक्षी उत्सव के बाद माना जा रहा था कि मायावती और सोनिया गांधी की मित्रता मुकम्मल हो गई है। इस गठबन्धन का पहला प्रयोग मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, और राजस्थान में होने का आकलन था। कांग्रेस इसे लेकर खुश थी। उसे लगा कि बंगलुरू की गर्मजोशी कामयाब साबित होगी। लेकिन मायावती के झटके ने बंगलुरू की बातों को व्यर्थ बना दिया। बंगलुरू की विपक्षी बयार बहुत जल्दी बेअसर होने लगी है।
    मायावती ने कांग्रेस के साथ गठबन्धन पर फिलहाल विराम लग दिया है। ऐसा नहीं कि वह केवल बयानबाजी कर रही है। वह कांग्रेस को दरकिनार करने की लाइन पर अमल भी कर रही हैं। छतीसगढ़ में उन्होंने कांग्रेस को पूंछा तक नहीं। अजित जोगी की पार्टी से बसपा का समझौता ही गया। कांग्रेस देखती ही रह गई। मायावती ने कांग्रेस के प्रति गंभीर रुख दिखाया। कहा कि वह  बसपा को खत्म करने की साजिश रच रही है। इसलिए मध्यप्रदेश और राजस्थान  में बसपा  अकेले चुनाव में उतरेगी।
    बसपा के इस फैसले से महागठबन्धन की अटकलों पर उल्टा असर हुआ है। इसके लिए केवल मायावती को ही दोष नहीं दिया जा सकता। सभी नेता इसके लिए जिम्मेदार है। सभी अपने अपने हित में लगे है। एक दूसरे के प्रति अविश्वास में कोई कमी नहीं आई है। महागठबंधन की विपक्षी नेता केवल चर्चा ही करते रहे। इसे लेकर कोई भी गंभीर नहीं था। कोई सार्थक एजेंडा सामने रखा है । ही यह तय नहीं गठबंधन का नेता कौन होगा। दिग्विजय सिंह ने कहा था कि मायावती पर मोदी सरकार का बहुत दबाव है। दिग्विजय ने मायावती के भाई पर छापेमारी और प्रवर्तन निदेशालय की कार्यवाई का उल्लेख किया था। यह गौरतलब है कि दिग्विजय सिंह का बयान बसपा और जोगी समझौते के बाद आया था। कांग्रेस को यह अनुमान हो गया था कि बसपा उससे समझौता नहीं करेगी। बताया जाता है कि दबाब के लिए दिग्विजय से बयान दिलाया गया। रणनीति यह थी बसपा पर दबाब बना तो थी ,नहीं तो इसे दिविजय का निजी बयान बता कर मसले को संभाला जाएगा। इधर मायावती कांग्रेस से दूरी बनाने का निर्णय पहले ही कर चुकी थी।उन्होंने कहा कि कांग्रेस का अहंकार सिर चढ़कर बोल रहा है। उस ने हमेशा दगा कर पीठ में छुरा घोपा है। वह हमारी पार्टी को समाप्त करने का षड्यंत्र कर रही है।  मायावतीराजस्थान और मध्यप्रदेश में गठबंधन न करने की बात कही।
    जाहिर है कि विपक्ष की एकता का आधार नकारात्मक ही था। ये केवल भाजपा या नरेंद्र मोदी को हटाने के नाम पर चुनाव लड़ना चाहते है। इसके अलावा इन्होंने आज तक किसी सकारात्मक बिंदु पर चर्चा ही नहीं कि है। एक दूसरे के प्रति इनमें सम्मान या विश्वास की भावना ही नहीं है। जिस प्रान्त में जिस पार्टी का प्रभाव है , वह किसी अन्य को तरजीह ही नहीं देना चाहती। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस और वामपंथियों को उभरने का मौका नहीं देना चाहती। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच दशकों की दुश्मनी के घाव मिटना आसान नहीं है।
    प्रायः सभी प्रदेशो में यही स्थिति है। विपक्षी पार्टियां एक दूसरे को कमजोर करके अपना वर्चस्व बढ़ाने का प्रयास करना चाहती है। जिससे उन्हें सौदेबाजी में आसानी हो। इस मसले पर कांग्रेस की भूमिका से भी अन्य पार्टियां निराश है। उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के तौर तरीके और बयान सहयोगियों की भी छवि बिगाड़ देंगे। इसलिए उनसे दूरी बनाकर ही रहना उचित होगा। इसी प्रकार मायावती का सपा पर विश्वास न करना भी स्वभाविक है। उन्होंने जो मंजर देखा है ,उसे गठबन्धन की पैरवी करने वाले समझ नहीं सकते। इसी लिए कुछ समय पहले मायावती ने कहा था कि वह किसी की बुआ नहीं सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही वह समझौता करेंगी। इससे भी जाहिर हो गया है कि आपसी अविश्वास के चलते महागठबन्धन का सपना पूरा होना कठिन अवश्य होगा।

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