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    अंदर का रावण

    By October 19, 2018 festival No Comments3 Mins Read
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    साभार: विकास गुप्ता
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    Post Views: 576

    व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी

    मैं नहीं चाहता मेरे अंदर का रावण मरे! मैं उसे हमेशा जिंदा रखना चाहता हूं। वो जिंदा रहेगा तो दुनिया के आगे मेरा कमीनापन उजागर करता रहेगा। मुझे भरे बाजार नंगा करता रहेगा। मेरा सच और झूठ सामने लाता रहेगा।

    हां, मैं बहुत अच्छे से जानता हूं कि रावण की छवि दुनिया-समाज में कतई अच्छी नहीं। उस पर कपटपूर्ण सीता हरण और राम से युद्ध करने संबंधित तमाम इल्जाम हैं। जिद्दी, और अहंकारी भी उसे कहा जाता है। इसीलिए लोग रावण से इतनी नफरत करते हैं। शायद ही कोई अपने बच्चे का नाम रावण रखता हो। उसकी पूजा करता हो। उसे सम्मान देता हो। तब ही तो हर दशहरे पर अपने अंदर के रावण को मारने का आवाहन किया जाता है।

    मगर रावण है की मरता ही नहीं। देश, दुनिया, समाज के भीतर उसकी पहुंच दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है। बलात्कार, चोरी, डकैती, घपला, घोटाला, हत्या आदि में हमें रावण का ही प्रतिरूप देखने-सुनने को मिलता है।

    विडंबना देखिए, हमारे बीच से न बुराई का अंत हो पा रहा है न शोषण का। बल्कि और गहरा ही रहा है। तिस पर भी लोग कह रहे हैं, अपने अंदर के रावण को मारिए। मरेगा क्या खाक, जब हम ही नहीं चाहते कि वो मरे।

    वैसे एक बात कहूं, बड़ा मुश्किल है अंदर के रावण का मार पाना। कोशिश चाहे कितनी ही कर लीजिए पर किसी न किसी रूप में रावण रहेगा जिंदा ही। पूरी तरह वो खत्म हो ही नहीं सकता। जिस दिन रावण मर लिया, समझिए उस दिन देश में रामराज्य आने से कोई नहीं रोक पाएगा। अमरीका भी नहीं।

    जो हो लेकिन मैं अपने भीतर के रावण को जिंदा रखना चाहूंगा। क्योंकि ज्यादा सभ्य और ईमानदारी पूर्ण जिंदगी मैं जीना नहीं चाहता। जिंदगी में कुछ तो ऐसी बदनामियां-बुराइयां हो ताकि लोग भी मुझे- इस बहाने ही सही- याद तो रखें। जब कभी रावण का जिक्र हो, साथ में मेरा नाम भी लिया जाए। समाज में सभी अच्छा करने वाले होंगे तो बुरों को कौन पूछेगा! अच्छाई-बुराई में बैलेंस बराबर का होना चाहिए।

    कहना न होगा मौजूदा रावणों से कहीं बेहतर उस समय का रावण था। वो जो भी, जैसा भी था कम से कम आज के रावणों जितना भ्रष्ट तो नहीं था। हां, ये बात अलग है कि भीषण अहंकार के कारण उसकी मति मारी गई थी। जिसकी अंत में उसे उचित सजा भी मिली। वो कहावत है न- विनाश काले, विपरीत बुद्धि।

    तो इसीलिए, मैं चाहता हूं मेरे अंदर का रावण थोड़ा-बहुत जीवित रहे। ताकि कुछ डर भी मन में बना रहे। सच कहूं- कभी-कभी तो मेरा दिल अपना नाम रावण कर लेने का भी करता है। मगर…।

    इस जन्म में तो खैर बनावटी रावण का किरदार ही निभा रहा हूं। पर चाहता हूं अगला जन्म रावण के रूप में ही लूं। आखिर अनुभव तो ले सकूं रावण की विकराल इमेज का। लेकिन विष नाभि में न रख किसी डिजिटल बॉक्स में रखूंगा।

    फिलहाल, अभी मेरे अंदर का रावण पूछ रहा है कि मैं तो किसी ‘मी टू’ कांड में शामिल नहीं?

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