व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
इन दिनों मेरे साथ कुछ भी ठीक न हो रहा। कभी बनता काम बिगड़ जाता है, तो कभी सड़क चलते कोई लड़ लेता है। चार रोज हुए, उल्टे पैर की कन्नी उंगली में ऐसी चोट लगी कि दिन में चांद-सितारे साफ नजर आने लगे। जैसे-तैसे उससे करार पाया तो अभी कोई मेरा मोबाइल चुरा ले गया। परसों जेब से पांचों का नोट गिरकर जाने किस का भला कर गया।
आलम यह है कि अब तो खुद की शक्ल आईने में देखने से ही घबराने लगा हूं, क्या पता, आईना कहीं टेढ़ा-मेढ़ा न हो जाए!
शहर के सबसे समझदार ज्योतिष को अपना हाथ दिखलाया तो उन्होंने मेरी राशि के ग्रहों का चाल-चलन दुरुस्त न बताकर दो हजार रुपए सीधे कर लिए। साथ में एक उपाय और बता दिया कि रोज आधी रात के बाद गधे की पूंछ का बाल तोड़कर शमशान की मिट्टी में गाड़ दूं। इससे बिगड़े काम बनने शुरू हो जाएंगे। लेकिन इस बात का खास ख्याल रखूं कि गधा हर बार अलग चरित्र का होना चाहिए। क्या गधों का भी चारित्र होता है?
मेरा कोई गधों का कारोबार तो है नहीं कि हर रोज एक नया गधा ढूंढकर उसके चरित्र का आंकलन करूं। यों भी, शहर में हर रोज एक नए गधे को ढूंढना, सड़क पर गड्ढे ढूंढने से भी कठिन काम है।
अतः ज्योतिष महाराज के उपाय से अपना पिंड छुड़ाया।
बहुत सोचने पर मैंने पाया कि ये सब मेरे ‘ग्रह-दोष’ के कारण न होकर मेरे ‘पाप का घड़ा’ भरने की वजह से है। मतलब- मेरे पापों का घड़ा भर चुका है। जब पाप का घड़ा ओवरफ्लो होने लगता है तब जीवन में ऐसी खतरनाक किस्म की घटनाएं होने लगती हैं। काम बिगड़ने और कलेजा मुंह को आने लगता है।
यह बात अलहदा है कि किसी के पाप का घड़ा देर से भरता है तो किसी का जल्दी। लेकिन भरता अवश्य है, यह तय है।
मगर मैं मेरे पापों का घड़ा भरने से परेशान कतई नहीं हूं। बल्कि खुश ही हूं कि चलो, पाप का घड़ा मेरी उम्र के चालीसवें बसंत में ही भर गया। वरना तो लोगों के पापों का घड़ा अस्सी-नब्बे साल तक भी न भर पाता। यह ऊपर वाले की मुझ पर अतिरिक्त कृपा रही। मैं उसका ऋणी हूं।
समय रहते जो काम निपट जाए उसी में भलाई है। मैं भी भला कब और कहां तक अपने पाप का घड़ा यहां-वहां लिए-लिए घूमता-फिरता।
अभी हाल एक बिन मांगी सलाह मिली है, चूंकि मेरे पाप का घड़ा भर चुका हूं अतः मैं गंगा नहा आऊं। लेकिन मैं ऐसा करूंगा नहीं। क्योंकि मैं नहीं चाहता, मेरे पापों को धोकर गंगा थोड़ी-सी भी अपवित्र हो।







