दिलीप अग्निहोत्री
दावात काले रंग की स्याही से भरी होती है लेकिन उससे जो सार्थक शब्द उकेरे जाते है, वह समाज को रोशन करते हैं। बात जब कलम दावात के संम्मान की हो ऐसे ही शब्दों की गूंज होती है। लखनऊ में कलम दावात संम्मान के नाम से आयोजन किया गया। इसमें अनेक प्रतिष्ठित लोगों का सम्मान किया गया। मुख्य आकर्षण कवि सम्मेलन था। जिसमें प्रतिष्ठित कवियों ने काव्य पाठ किया। सनातन धर्म में यम द्वतिया और भगवान चित्रगुप्त की महिमा का वर्णन है। कार्यक्रम इसी अवसर पर आयोजित था, ऐसे में उनका पूजन किया गया। कवि सम्मेलन का प्रारंभ सनातन परंपरा के अनुसार मां सरस्वती की वंदना से हुआ।कवियत्री शिखा श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत स्तुति ने माहौल को भक्तिपूर्ण बना दिया-
सुन लो मईया वीणा वाली,
करुण हृदय क्रंदन का।
झुका रही हूं शीश चरण में,
शत शत है अभिनन्दन।
कलम के सम्मान का अवसर था। वरिष्ठ कवि उदय प्रताप ने कलम संभालने वाले की प्रतीकात्मक अर्हता का सटीक उल्लेख किया। उदयप्रताप स्वयं राजनीति में रहे, तीन बार सांसद बने, सत्ता के गलियारों को बहुत करीब से देखा, पिछली सरकार में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष थे। वह कम और सरल शब्दों में अपनी बात कहने में माहिर है। चंद शब्दों में बड़ी बात कही, जो अवसर के बिल्कुल अनुकूल थी–
जो सर से पांव तक खुद्दार नहीं है।
हाथों में कलम लेने का हकदार नहीं है।।
बेबाक काव्य की रचना बिना खुद्दारी के नहीं हो सकती।
उदय प्रताप सिंह का जन्म देश की परतंत्रता के दौर में हुआ था। उनका अनुभव व्यापक है। देश की भलाई के लिए जान न्योछावर करने वालों की भावनाओं की वह अनुभूति करते है। यह बलिदान जज्बे के कारण होता है। जिसमें निजी और पारिवारिक हित की कामना नहीं होती। वह केवल बढ़िया समाज और मजबूत राष्ट्र के लिए निजी सुखों का त्याग करने वाले लोग थे। लगा कि आजादी के बाद उन नायकों का सपना साकार होगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जातिवाद, परिवारवाद, भाई भतीजावाद, भ्र्ष्टाचार, घोटाले आदि बलिदानियों के सपने साकार होने में बाधक बन गए। शायद इसी को उदय प्रताप ने प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया–
कभी कभी सोचता हूँ,
वे बेचारे छले गए हैं।
जो फूलों का मौसम लाने
की कोशिश में चले गए हैं।
जब समाज और देश की जगह पदलिप्सा में व्यक्ति विशेष का अतिशय महिमा मंडन होने लगता है, तब कलम की गरिमा गिरती है–
बेहद करम है आपका,
पर दिल को क्या करें।
इंसा को खुदा कहने को तैयार नहीं।
भारतीय समाज मे बुजुर्गों को बहुत सम्मान दिया गया। कुछ वर्ष पहले तक यहां वृद्धाश्रम की कल्पना भी संभव नहीं थी। लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से यहां भी बदलाव आने लगा है। ओल्ड एज होम बनने लगे है। तीज त्योहार पर बेटे बेटी उनसे मिलने चले जाएं तो बड़ी बात। इसके बाबजूद बुजुर्ग लोग उन्हें आशीर्वाद ही देते है। मार्मिक पंक्तियां है–
हम बुजुर्गों पर दुआओं के लिए कुछ भी नहीं
खुश रहे वे भी जो कहते हैं दुआ कुछ भी नहीं।
इसके आगे जीवन की सुंदर व्याख्या है। वस्तुतः इस जीवन का कोई भरोसा नहीं है–
बून्द में अटकी हवा है, बुलबुला कुछ भी नहीं।
किस कदर मगरूर है, जैसे खुदा भी नहीं।।
समाज में देखा जाता है कि लोगों को दूसरों की निंदा में बहुत सुख मिलता है। ऐसे करने से उन्हें कुछ नैतिक लाभ भी नहीं होता। बल्कि नुकसान ही होता है। क्योंकि यह प्रवृत्ति अपनी कमियां देखने नहीं देती। जबकि अपनी कमियां और दूसरे की अच्छाइयां देखनी चाहिए–
हम किसी के ऐब का सागर खंगाले किस लिए।
आज तक इन गोताखोरों को मिला कुछ भी नही।।
अनेक लोग जीवन भर गलत तरीके से सम्पत्ति कमाने में लगे रहते है। वह बदहवास होकर उसके पीछे भागते रहते है। ऐसे लोगों की आँख इन पंक्तियों से खुलनी चाहिए-
मुट्ठी बंधे आये थे
मुट्ठी खोले जयेगे
इसे समझ लो तो
समझने के लिए
कुछ बचा कुछ नही।।
विष्णु सक्सेना संवेदना के कवि है। उन्होंने निजी और समाज जीवन के संबंधों का मार्मिक चित्रण किया–
सोचता था कि मैं तुम गिर के सम्हल जाओगे।
रौशनी बन के अँधेरे को निगल जाओगे।
ना तो मौसम थे ना हालात ना तारीख ना दिन।
किसे पता था कि तुम ऐसे बदल जाओगे।
निश्चित ही किसी विश्वासपात्र की बेरुखी आहत करती है। बहुत लोग समय के हिसाब से अपने को बदल लेते है। सच्चा साथी वही होता है, जो आपदा में भी साथ रहे। ऐसा प्रेमभाव समर्पण की भावना से मिलता है–
तू हवा है तो कर ले अपने हवाले मुझको,
इससे पहले की कोई और बहा ले मुझको,
आइना बन के गुजारी है जिंदगी मैंने,
टूट जाऊंगा बिखरने से बचा ले मुझको।
जो आज कर गयी घायल वो हवा कौन सी है,
जो दर्द-ए-दिल करे सही वो दवा कौन सी है,
तुमने इस दिल को गिरफ्तार आज कर तो लिया,
अब जरा ये तो बता दो की दफा कौन सी है।
सौरभ श्रीवास्तव वीर रस के युवा कवि हैं। उनकी वाणी में भाव के अनुरूप आज है। वह देश के टुकड़े करने, आतंवादियों का बचाव करने, आजादी की मांग पर थिरकने वाले युवकों को धिक्कारते हैं। उनकी हरकतों को लोकतंत्र के विरुद्ध मानते है। लोकतंत्र हूँ भारत का कविता से कथित प्रगतिशील चिंतन पर प्रहार किया।
गजेंद्र प्रियांशु ने माहौल को हस्यमय बनाया–
भोर था प्यार अब दोपहर हो गया,
स्वप्न का हर भवन
खंडहर हो गया,
तुम संवरती सैफई हो गई
मैं उजड़कर मुजफ्फरनगर हो गया।
कवि सम्मेलन श्रोताओं को बांधे रखने में सफल रहा। लखनऊ के मुकुल महान, मनीष हिंदवी ने इस कार्यक्रम की रचना, संयोजन और संचालन किया।







