अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना गलत नहीं है कि भ्रष्टाचार की मार सबसे ज्यादा गरीबों पर पड़ती है। असम के बोगीबील में रेल सह सड़क पुल के उद्घाटन के अवसर पर व्यक्त की गई प्रधानमंत्री की यह पीड़ा आकस्मिक नहीं होगी, बल्कि वर्षो के उनके शासन-प्रशासन के अनुभव पर आधारित होगी।
राजीव गांधी ने भी स्वीकार किया था कि गरीबों के कल्याण के लिए खर्च की जाने वाली राशि उनके पास बहुत कम पहुंच पाती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार आर्थिक विकास को न केवल विलंबित करता है, बल्कि उसे विकृत भी कर देता है। हालांकि भ्रष्टाचार से छोटे-बड़े व्यवसायी भी प्रभावित होते हैं, लेकिन गरीबों पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है।
दरअसल, गरीबी और भ्रष्टाचार का रिश्ता काफी गहरा है। गरीबी भ्रष्टाचार को आमंत्रित करती है, तो भ्रष्टाचार गरीबी को बढ़ाती है। ऐसे में जब भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका हो, तो यह आवश्यक हो जाता है कि व्यवस्था में सुधार किया जाए। तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में साक्षात्कार को मोदी सरकार द्वारा खत्म करना इसी दिशा में उठाया कदम माना जा सकता है, जिसमें बिचौलिये नौकरी दिलाने के नाम पर युवाओं से पैसे लेते थे। इसी तरह कल्याणकारी योजनाओं और सरकारी सब्सिडी को आधार कार्ड से जोड़ना इसकी एक और बानगी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इससे बहुत से बिचौलिये खत्म हो गए होंगे और गरीबों को लाभ हुआ होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी आधार योजना की संवैधानिकता पर दिए फैसले में इसकी अहमियत को स्वीकार किया था और इस पर रोक नहीं लगाई थी। बेशक मोदी सरकार भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए प्रयासरत है, लेकिन अभी उसे इस दिशा में बहुत-से ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे गरीबों को मदद मिल सके। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी को मामले की गंभीरता का अहसास नहीं है।
सरकार खुद मान रही है कि वह इस दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। वैश्वीकरण के दौर में जब दुनिया की विकासशील अर्थव्यवस्था वाली सरकारों पर कई तरह के दबाव पड़ रहे हों और वहां का बौद्धिक समाज उसके प्रति प्राय: चुप्पी साध लेता हो, तब आम जन की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह सरकारों का ऐसे नाजुक क्षणों में समर्थन करें।







