जो प्यार में हैं
प्यार और बरसता है उन पर
जो नहीं हैं प्यार में
वे तरसते हैं प्यार की एक बूँद को भी
मैं बहुत वक़्त से प्यार में हूँ
बहुत वक़्त से नहीं था प्यार में
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असंभव में बसने की चाहना रखने वाले कवि अविनाश मिश्रा का दूसरा काव्य-संग्रह इसी साल वसंत पंचमी के ठीक बाद और वैलेंटाइन डे से तनिक पहले आ रहा है। 80 कविताओं का यह संग्रह ‘चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान’ नाम से Rajkamal Prakashan Samuh से छप रहा है। लघु प्रेम कथाओं के दौर में ‘कामसूत्र’ से प्रेरित यह प्रेम की लघु कविताएँ हैं। आकार में लघु, लेकिन अपनी निर्मिति और व्याप्ति में पूर्ण!
अपनी एक बातचीत में अविनाश ने कहा था–“जब मेरी कविताएं प्रकाशित होना शुरू हुईं, तब वीरेन डंगवाल ने — जिनसे मैं पहली बार कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी के जरिए मिला — पहली मुलाकात में ही मुझसे कहा कि बहुत निराश नहीं रहना चाहिए. यह दुनिया बहुत नागवार लगती है, लेकिन बहुत सुंदर भी है.”
सुंदरता के संधान में कवि की दृष्टि कहाँ ठहरी, यह उनकी एक कविता में लक्षित कर मैं चकित रह गया–
“उज्जवल है वह जो अप्रकाशित है
देखती हुई स्त्री की आंखों की तरह उज्ज्वल”
उपरोक्त काव्य-पंक्ति आने वाले संग्रह से नहीं है, लेकिन जैसे यह इसी संग्रह की पूर्व घोषणा है! कवि की आश्वस्ति है।







