डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारतीय पर्वो में समरसता का सन्देश समान रूप से समाहित रहता है। समाज के सभी वर्गों की इसमें समान रूप से भागीदारी होती है। यही तथ्य पर्वों को सार्थक बनाते है। भारत कृषि प्रधान देश रहा है। प्राचीन काल से यहां पर्यवरण के प्रति चेतना रही है। प्रकृति को यहां बहुत महत्व दिया गया। इस बार अच्छा सन्योग था। प्रयागराज में अर्ध कुंभ प्रारम्भ हुआ। मकर संक्रांति के अवसर पर पहला स्नान हुआ। मकर संक्रांति के अवसर पर लखनऊ में आयोजित हुआ। इसमें उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी भी शामिल हुए। राम नाईक ने कहा कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन होते हुए भी वह पहले भारतीय हैं।वसुधैव कुटुम्बकम का लघु चित्र सभी सामाजिक समारोहों में देखने को मिलता है। यही सन्देश ऐसे उत्सव के माध्यम से पूरे विश्व में जाता है। इस बार मकर संक्रांति और खिचड़ी भोज कार्यक्रम में नया रूप उत्तर प्रदेश में दिखाई दिया। जनवरी माह में अनेक ऐसे कार्यक्रम हुए। इसमें वाराणसी में तीन दिवसीय प्रवासी भारतीय सम्मेलन भी उल्लेखनीय है। जिसमें विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक क्षेत्र, धर्म को परे रखते हुए भारतीय होने के नाते प्रतिनिधित्व रहा। यह सम्मेलन पहली बार उत्तर प्रदेश वाराणसी में हुआ।
विदेश से आने वाले प्रवासियों ने इस बार वाराणसी का बदला हुआ स्वरूप देखा। मन्दिर परिसर, गंगा का घाट, या गंगा का स्वच्छ जल, सभी मे बड़ा सुधार हुआ है। इस वर्ष का कुंभ भी परिवर्तन लिये हुए है क्योंकि पूर्व का कुंभ इलाहाबाद में होता था जिसको वर्तमान सरकार द्वारा पौराणिक नाम प्रयागराज दिया गया है। संगम के घाट पर स्थित किले के अक्षयवट और सरस्वती कूप को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिये खोला गया है। नाईक ने कहा कि मकर संक्रांति का पर्व भारत का सांस्कृतिक त्यौहार है।
उत्तर प्रदेश में यह खिचड़ी, महाराष्ट्र में तिल-गुड़ और तमिलनाडु में पोंगल पर्व के नाम से तथा देश के अन्य प्रदेशों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। भारत के सभी पर्व कोई न कोई कारण से पर्यावरण से जुड़े हुए हैं। भारत के बाहर भी रहने वाले जो भारतीय हैं उनमें भारतीयत्व का एक नया रूप साकार हो रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वधर्म समभाव पर विचार करने की जरूरत है। यह संकल्प लेना होगा कि जो पुरातन तत्व है कि सारी दुनिया एक परिवार है, उसको लेकर हम आगे चलेंगे।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी ने कहा कि दाल और चावल को अलग अलग खाने से कोई स्वाद नहीं मिलता।लेकिन दोनों को मिलाकर एक रूप खिचड़ी देने में वह स्वादिस्ट हो जाती है। भारतीय संस्कृति भी खिचड़ी के समान है जो विभिन्न रूप में संगठित होकर देश को विकास के पथ पर आगे ले जाती है। खिचड़ी पर्व में सामूहिकता का सन्देश निहित है।
स्पष्ट है कि भारत के सभी पर्व नए उत्साह का संचार करते है। इसके व्यापक सन्देश को समझने और उस पर अमल करने की आवश्यकता है। इसके अलावा पर्यावरण, कृषि के प्रति भी जागरूकता रहनी चाहिए। यह भारत ही नहीं आज सम्पूर्ण विश्व की आवश्यकता है। कुछ समय पहले अमेरिका के मेडिकल साइंस विशेषज्ञों ने यह यह माना कि खिचड़ी सम्पूर्ण पोष्टिक भोजन है।
वहां भी खिचड़ी का चलन बढा है। भारत ने यह तथ्य बहुत पहले ही बता दिया था। इसे उत्सव का रूप प्रदान कर दिया। धनी वर्ग को प्रेरित किया गया कि वह वंचित वर्ग की सहायता करे। यह विचार समाज को मजबूत बनाता है।








4 Comments
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