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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    खतरे की घंटी बजाता जलवायु संकट

    By January 23, 2019 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    देश की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। मौसम में बदलाव का गहरा असर खेती-किसानी पशुपालन और दूध उत्पादन तीनों पर ही पड़ता है, क्योंकि यह सभी एक दूसरे से जुड़े हैं।

    इस संबंध में कृषि मंत्रालय की जो रिपोर्ट सामने आई है वह आने वाले दिनों में बड़े संकट का संकेत दे रही हैं। कृषि मंत्रालय ने खेती पशुपालन और दूध उत्पादन पर जलवायु संकट के प्रभाव का अध्ययन करवाकर संसदीय समिति को इसकी रिपोर्ट सौंपी थी। कृषि मंत्रालय की इस आकलन रिपोर्ट का जिक्र पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन से संबंध संसद की प्राक्कलन समिति के अपने प्रतिवेदन रिपोर्ट में हैं।

    रिपोर्ट में जैसा की आशंका जताई गई है कि उसके अनुसार आने वाले दिनों में कृषि पशुपालन और दूध उत्पादन तीनों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। ऐसे संकट कृषि को तो प्रभावित करेगा ही साथ ही अनाज और दूध की उपलब्धता में भी भारी कमी आ सकती हैं। अब ऐसे सवाल सामने हैं जिनके तत्काल समाधान की आवश्यकता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु संकट के कारण खेती पर पड़ने वाला असर अगले ही दशक में दिखने लगेगा। 2020 तक चावल की पैदावार में 4 से 6 फ़ीसदी व आलू में 11 फीसद मक्का में 18 फ़ीसदी और सरसों की पैदावार में 2 फीसद तक कमी आ सकती हैं।

    वातावरण का तापमान जैसा की उम्मीद है कि यदि 1 डिग्री बढ़ा तो गेहूं की पैदावार में 70 लाख टन की कमी आ सकती हैं। इस संकट का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों पर पड़ेगा। इन राज्यों में अनाज की कमी होने से पैदावार और पशुधन दोनों पर गहरा असर पड़ेगा और दूध उत्पादन में भी भारी कमी देखने को मिलेगी।

    केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह खतरे की घंटी इसलिए भी है क्योंकि यह संकट अगले 3 दशकों में 10 गुना बढ़ सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि जलवायु संकट अंधाधुंध विकास की ही देन है। इससे निपटने को दुनिया के कई देश ज्यादा चिंतित और सचेत तो हुए हैं लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई भी ठोस उपाय सामने नहीं आ पाया है। यह संकट भारत ही नहीं अन्य विकासशील देशों के लिए भी बड़ी चुनौती हैं। वैसे भी भारत का कृषि क्षेत्र और किसान पहले से ही संकट झेल रहे हैं। वैसे भी अब किसानों के लिए खेती करना आसान नहीं रह गया है अनाज और दूध का संकट बढ़ा तो देश की एक बड़ी आबादी का काम कैसे चलेगा। देश को यदि इस संकट से बचाना है, तो तत्काल कोई ठोस रणनीति बनानी ही होगी। जिससे इस संकट से पार पाया जा सके।

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