Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 564 “अबे, सुन बे, गुलाब, भूल मत जो पाई ख़ुशबू, रंग-ओ-आब, ख़ून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट !” महाप्राण कौन देता है जान फूलों पर कौन करता है बात फूलों की वो शराफ़त तो दिल के साथ गई लुट गई कायनात फूलों की मख़दूम, अविनाश मिश्र से
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन