अबे, सुन बे, गुलाब

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“अबे, सुन बे, गुलाब,
भूल मत जो पाई ख़ुशबू, रंग-ओ-आब,
ख़ून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट !”

  • महाप्राण

कौन देता है जान फूलों पर
कौन करता है बात फूलों की

वो शराफ़त तो दिल के साथ गई
लुट गई कायनात फूलों की

  • मख़दूम, अविनाश मिश्र से 

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