आतंकी हमले से उपजी युद्ध की स्थिति से घबराये पाक प्रधानमंत्री की समझ नहीं आ रहा है की वह क्या बोलें और क्या न बोलें! …और अब मीडिया में आए उनके बयान से निराशा और गुस्सा दोनों पैदा करने वाला है। खैर, भारत ने उसका उपयुक्त प्रत्युत्तर दे दिया है जो आवश्यक था।
इमरान खान यह स्वीकारने के लिए तैयार ही नहीं है कि इतने बड़े हमले में उनके देश की कोई भूमिका है। उल्टे वे भारत को नसीहत दे रहे हैं कि वह हर आतंकवादी हमले का आरोप पाकिस्तान पर लगाना बंद करे। वे पूछते हैं कि इससे पाकिस्तान को क्या फायदा होगा? यह प्रश्न उनको अपने-आपसे पूछना चाहिए कि आखिर भारत में आतंकवाद प्रायोजित करने से आज तक उसे क्या मिला है? यह पूरे पाकिस्तान को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित कर सकता है। किंतु यह तभी हो सकेगा जब वे ईमानदारी से स्वीकार करें कि आतंकवाद को जन्म देने से लेकर उसके पालन-पोषण और विदेश नीति के रूप में उसका निर्यात उनके देश की सरकारी नीति रही है।
पुलवामा हमले की जिम्मेवारी जैश-ए-मोहम्मद ने लिया है तो उंगली किसकी ओर उठेगी? जैश कहां से संचालित होता है? उसका प्रमुख मसूद अजहर कहां रहता है? क्या इमरान को इसकी जानकारी नहीं? प्रधानमंत्री होकर वह किसको मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं? इमरान कह रहे हैं कि अगर कार्रवाई करने योग्य खुफिया सूचना है तो हमें भारत दे कार्रवाई करेंगे। भारत ने ठीक कहा है कि मुंबई हमले, पठानकोट हमले हमलों की पूरी सूचना देने पर पाकिस्तान ने क्या कार्रवाई की कि अब वह करेगा। एक ओर वे कह रहे हैं कि हम भारत से आतंकवाद पर भी बातचीत करने को तैयार हैं और दूसरी ओर धमकी भी दे रहे हैं कि अगर भारत ने हमारे विरुद्ध कार्रवाई की तो हम जवाबी हमला करेंगे। तो क्या भारत उनकी धमकी से डरकर आतंकवादी हमला झेलता रहे?
इमरान कह रहे हैं कि पाकिस्तान अब एक बदला हुआ मुल्क है। मगर हम यह तब मानते, जब वह कहते कि भारत में हुए हमले के दोषियों को सजा देने के लिए पाकिस्तान तैयार है। वे इसके विपरीत बात कर रहे हैं तो हमारे लिए वही पाकिस्तान है जो पहले था। आप यह मानेंगे नहीं कि भारत में हो रहे हमलों में पाकिस्तान की कोई भूमिका है तो फिर हमको अपनी रक्षा एवं देश को सुरक्षित करने के लिए हरसंभव कार्रवाई करनी ही होगी। जब भारत कार्रवाई करेगा तो यह सोचकर करेगा कि पाकिस्तान इसका जवाब देगा।







