हर ‘किरदार’ मैं ‘मुसीबतों’ मैं *सहारा’ और ‘निःस्वार्थ प्रेम’ केवल ‘नारी’ ही कर सकती हैं। कोई और नहीं।
In every character, only women can do selfless love and support in adverse situations, nobody else.
औरत
वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है,
पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है,
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूंध रही है?
गूंध रही है मानों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है,
एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक़्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गईं
एड़ी घिस रही है,
एक औरत अनंत पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है,
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है,
एक औरत अँधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसर जागती
शताब्दियों से सोयी है,
एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं.
– चंद्रकांत देवताले
औरतें यहाँ नहीं दिखतीं
औरतें यहाँ नहीं दिखतीं
वे आटे में पिस गई होंगी
या चटनी में पुदीने की तरह महक रही होंगी
वे तेल की तरह खौल रही होंगी
उनमें घर की सबसे ज़रूरी सब्ज़ी पक रही होगी
गृहस्थाश्रम की झाड़ू बनकर
अंधेरे कोने में खड़े होकर
वे घरनुमा स्थापत्य का मिट्टी होना देखती होंगी
सीलन और अंधेरे की अपठ्य पांडुलिपियाँ होकर
वे गल रही होंगी
वे कुँए में होंगी या धुएँ में होंगी
आवाज़ें नहीं, कनबतियाँ होकर
वे फुसफुसा रही होंगी
तिलचट्टे सी कहीं घर में दुबकी होंगी वे
घर में ही होंगी
घर के चूहों की तरह
वे
घर छोड़कर कहाँ भागेंगी?
चाय पियें,
यह
उनकी ही बनायी है।
– देवी प्रसाद मिश्र







