साग-शब्जी हो या अनाज, फल-फूल हो या दुधारू पशु सभी जगह लोग शंकर प्रजातियों (हइब्रिड) का ही सेवन कर अधिक से अधिक पैदावार-आमद पाना चाह रहे हैं। लेकिन क्या यह हमने कभी सोचने का प्रयास किया है कि उनके जेनेटिक चेंज से हमारी सेहत में कुछ न कुछ साइड इफेक्ट रहे हैं या नहीं। जरूर होंगे? इस बारे में हम क्यों नहीं सोच रहे हैं।
हमारे देश मे होने वाले बीज, पशु, औषधियां, फल-फूल आदि का सेवन हम और हमारे पूर्वज सदियों से करते आ रहे हैं। वह हमें एकदम स्वस्थ पोषक प्रदान कर रहे होते हैं। आज भी जिस घर में शिशु का जन्म होता है तो देशी गाय या देशी बकरी का दूध ही क्यों लोग ढूढ़ते हैं। क्यों नहीं कोई शंकर गाय का दूध बच्चे को देना चाहता है। अब लोग फिर से क्यों मोटे अनाज जौ, बाजरा, जोन्दरी, मक्का, चना, चटरी-मटरी आदि के आटे का सेवन कर रहे हैं। गेहू में क्यों कटिहा, हलना आदि प्रजातियों को ढूढ रहे हैं, जो सबसे पाचक होता था।
गन्ने में कोयम्बटूर, मनगो, 90, फुलहनी, चंपारन आदि गन्ने की मुलायम प्रजातियों का बीज मिलना अब दुर्लभ होता जा रहा है। बाजारवाद और आर्थिक तरक्की के चलते सबसे ज्यादा अगर कोई प्रभावित हुआ है तो हमारी कृषि। अगर हमारा खानपान प्रभावित हुआ तो बीमारियों की चपेट में आना तय मान लीजिये। देशी बीज जहां भी मिलें उन्हें थोड़ा-थोड़ा ही सही उपजाकर खानेभर का तो तैयार ही किया जा सकता हैं। खेती अभी भी पर्याप्त है।
आइये मैं आपको ऐसी ही टमाटर की एक विशेष प्रजाति से परिचित करा रहा हूँ। जिसे मैंने अभी मध्य प्रदेश में हुए हालिया चुनावी दौरे के दौरान टीकमगढ़ जिले के खंदिया गांव से जुटाया है। यह चिकटुआ देशी टमाटर की प्रजाति है। तुलनात्मक रूप में बाजार में आने वाले दो किलो टमाटर की जगह इसे सिर्फ ढाई सौ ग्राम ही प्रयोग कर पूरे स्वाद और खुशबू से लबरेज़ शब्जी तैयार कर सकते हैं। यदि घर के आगे कच्ची जगह नही है तो आप गमले में ही इसे तैयार कर छत के ऊपर, आंगन, गलियारे में रख कर इसे तैयार कर सकते हैं।
– रोहित उमराव







