उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने कमी को बताया सही और कहा आयोग का यह ऐतिहासिक निर्णय
लखनऊ, 08 मई 2019: उप्र विद्युत नियामक आयोग द्वारा अगले 5 सालों के लिये बगास, बायोमास, इस्माल हाइड्रो, सोलर, विन्ड इत्यादि के लिये बनने वाले सीआरई रेग्यूलेशन, 2019-2024 की प्रस्तावित कार्य योजना पर आज सार्वजनिक सुनवाई आयोग सभागार में नियामक आयोग चेयरमैन श्री आर पी सिंह, सदस्यगण श्री एस के अग्रवाल एवं श्री केके शर्मा की उपस्थित में सम्पन्न हुयी। जिसमें पावर कारपोरशन, नेडा के प्रतिनिधियों सहित पूरे प्रदेश के शुगर मिल मालिकों के सैकडों प्रतिनिधियों ने भाग लिया जहाॅं शुगर मिल एसोसियेशन की तरफ वरिष्ठ वकील अमित कपूर, डी डी चोपडा, अमित लाला सहित अनेकों अधिवक्ताओं ने अपनी बात रखते हुये आयोग द्वारा प्रस्तावित दरों को बहुत कम बताते हुये उसमें बढोत्तरी की मांग उठायी।
वहीं उप्र के विद्युत उपभोक्ताओं की तरफ से सुनवाई में शामिल उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आयोग द्वारा प्रस्तावित दरों को ऐतिहासिक बताते हुये आयोग के इस कदम की प्रशसा की और कहा कि यह पहली बार ऐसा हुआ है कि शुगर मिल के हाई प्राफाइल दबाव से अलग हटकर नियामक आयोग द्वारा बगास की प्रस्तावित दरों में लगभग 52 प्रतिशत की कमी प्रस्तावित की है जिसका लाभ प्रदेश की जनता को मिलेगा। वर्तमान में अलग-अलग वषांे के लिये जो शुगर मिलों द्वारा पैदा होनी वाली बिजली की दरंे रू0 6.19 प्रति यूनिट से लेकर रू0 6.75 प्रति यूनिट तक वर्तमान में लागू हैं उसमें आयोग द्वारा उठाये गये ऐतिहासिक कदम से रेग्यूलेशन बनने के बाद यदि प्रस्तावित दरंे लागू हुयी तो वर्तमान लागू दरों में रू0 2.25 प्रति यूनिट की कमी आ जायेगी। जिसका लाभ प्रदेश की जनता को मिलेगा। उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने पूर्व में बढी दरों के औचित्य पर ट्र-अप कराकर उसका लाभ प्रदेश की जनता को दिलाने की भी उठायी मांग।
उप्र राज्य विद्युत उपभेाक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आगे अपनी बात रखते हुये कहा कि वर्तमान में बगास की बिडिग रूट की जो दर रू0 4.78 प्रति यूनिट आयी है उस पर यदि गौर करें तो उसमें बगास की दर लगभग 915 मीटरिक टन निकलेगी। उसके आधार पर वर्तमान में पावर कारपोरेशन द्वारा मुडेरवा, पिपराइज व रमाला के पीपीए किये जा चुके हैं। ऐसे में बगास की दरें बहुत कम की गयी है यह सुगर एसोशियेशन का कहना गलत है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अभी इसमें और कमी हो सकती है। यदि कोयले की पिट हेड पर लागत निकाली जाये और उसमें से किराया, टैक्स व अन्य खर्चे निकाल दी जायें तो उसकी दरें 750 से 1000 मीटरिक टन के बीच आ रही है।
ऐसे में आयोग द्वारा प्रस्तावित दरों में और भी कमी किये जाने का पूरा औचित्य है। वर्तमान में आरपीओ आब्लीगेशन का कोई सवाल ही नही उठता क्योंकि पावर कारपोरेशन के पास मार्केट मंे सस्ती बिजली उपलब्ध है और उसी के चलते विगत दिनों पावर कारपोरेशन द्वारा रू0 3 प्रति यूनिट से भी कम दरों पर विन्ड पावर से लगभग 1500 मेगावाट करार किया गया है। ऐसे में बगास की मंहगी दरों का हर सतर पर विरोध होना चाहिये। बगास की दरें बढाने की बात करने वालों को यदि लगता है उनकी दरें कम हैं तो वह मेरिट आर्डर व एबीटी में आने की बात क्यों नही करते है। बगास से यदि पावर कारपोरेशन बिजली नही खरीदता और शुगर मिलों को लगता है घाटा हो रहा है तो उनके पीपीए मंे थर्ड पार्टी सेल का करार है। वह मार्केट मेें अपनी बिजली क्यांे नहीं बेचते वह शायद इसलिये क्योंकि मर्चेट पावर की दरें बहुत कम हैं इसलिये वह पावर कारपोरेशन को मंहगी दरें बेच कर उपभोक्ताआंे पर भार डलवाना चाहते हैं।
बैंकिंग पावर पूरी तरीके से खत्म होनी चाहिये क्योंकि यह इनफर्म पावर है जिस प्रकार से नेट मीटरिंग खत्म हो गयी अब बैंकिंग पावर भी खत्म होनी चाहिये। वर्तमान में सोलर जैसे निजी घराने बैंकिग करके नान पीक आवर्स में बडा फायदा कमा रहे हैं। वही हाल इन सबका भी होगा। वर्तमान मंे जो प्रस्तावित पैरामीटर है उससे बगास की दरों में लगभग रू0 2.25 प्रति यूनिट की कमी आ रही है। जिसमे वैरेबिल कास्ट जो लगभग 3.55 प्रति यूनिट था वह अब घटकर लगभग 1.55 प्रति यूनिट प्रस्तावित है। मानकों में थोडा और अध्यन किया जाये तो यह दरें और कम होंगी। जिस प्रकार से विगत दिनों अलकनन्दा पावर सहित अनेकांे आईपीपी की आरओई जीरो प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक तय की गयी है ऐसे में बगास की भी आरओई 5 प्रतिशत से ऊपर न की जाये। उपभोक्ता परिषद आयोग से यह निवेदन करना चाहता है कि आयोग विद्युत अधिनियम, 2003 के प्रम्बल में दी गयी व्यवस्था के तहत उपभोक्ता हित मेे कोई भी निर्णय लेने के लिये स्वतन्त्र है। ऐसे में प्रस्तावित दरांे में और कमी करके पूरे देश में एक नजीर पेश करनी चाहिये।







