हर दिन हैं माँ के।
हर दिन हैं माँ से।।
नहीं एक दिन से।
माप सकती इसे।।
नहीं मात्र शब्दों से।
लिख सकती इसे।।
है माँ बड़ी ईश्वर से।
यही सार हर धरम में।।
नहीं लिख सकती।
कलम कोई इसे।।
ये सृष्टि जो है।
वो भी तो माँ से।।
जो भी है राहत।
इस नाट्य जगत में।।
जो भी है सत्य।
इस मिथ्या जगत में।।
हाँ! वो राहत माँ से।
हाँ! हर सुकून माँ से।।
–अलका शुक्ला







