Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 555 दो दोहे संस्मरणों के देश फिर, ले चल मुझको मीत। जहाँ प्रीति का पर्व है, जहाँ मिलन के गीत। ……………………………………….. कभी – कभी साँसें कहें, बस इतना – सा काम। कुछ गीतों के गाँव में, कुछ पल को विश्राम। कमल किशोर ‘ भावुक ‘
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन