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    Home»Featured

    क्रूर एवं निर्दयी दीवान की हवेली का रहस्य

    By May 30, 2019 Featured No Comments5 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती
    राजस्थान के जैसलमेर से लगभग पांच किलोमीटर दूर अमर सागर गॉव के पास स्थित सालम सिंह की हवेली है यह हवेली पीले पत्थर से बनी है इसका निर्माण जैसलमेर के एक दीवान सालम सिंह ने वर्ष 1815 अपने रहने के लिए करवाया था। मौजूदा समय में सालम सिंह की ये हवेली एक संग्रहालय के रूप में मौजूद है इस हवेली की गिनती जैसलमेर के प्रमुख पर्यटक स्थलों में होती है।
    जर्जर होती हवेली:
    सालम सिंह की हवेली दूर से एक जहाज जैसी दिखती पीले रंग की यह हवेली जिसकी दीवारों के पीछे एक क्रूर एवं निर्दयी दीवान के जुल्मो की ज़िंदगी की वास्तविकता को दर्शाती है। जैसा की कहा जाता है कि हकीकत मे सालम सिंह एक भ्रष्ट, क्रूर, निर्दयी और शातिर दीवान हुआ करता था। वह राजस्थान जैसलमेर के किले पर राज करना चाहता था, उसकी इस महत्वाकांक्षा की वजह से उसने इस हवेली को किले से भी ऊँची बनवाई जिससे वह यंहा के राजा को अपने से नीचा दिखा सके, लेकिन राजा को दीवान की ये हरकत पसंद नहीं आई जिसके कारण उन्होंने हवेली की ऊपर की दो मंजिले तोड़वा दिया था।
    इस हवेली की प्रमुख विशेषता यह है की हवेली बिना सीमेंट और पानी के बनी हुई है, इस संपूर्ण हवेली को बिना तोड़े ही खोला जा सकता है और इसे पुनः बनाया भी जा सकता  है। इस हवेली के अंदर सजावट के लिए प्रचुर मात्रा में मोतीयों एवं कांचों का प्रयोग किया गया है। इसमें लगे कांच जिसे उस समय बेल्जियम से मंगवाए गये थे, मोतियों के स्थान वर्त्तमान समय में यह खाली नजर आते हैं शायद उसके वंशजो द्वारा इन मोतियों को निकाल लिये गये हैं। यदि हम इस हवेली को निर्माण के आधार पर देंखे तो यह हवेली जैसलमेर के सबसे बेहतरीन वास्तुकला के नमूनों में से एक है लेकिन वर्त्तमान समय में रखरखाव के अभाव में यह हवेली जर्जर होता चला जा रहा है।
    क्यों था सालम सिंह इतना क्रूर-निर्दयी? 
    सालम सिंह की निर्दयता और क्रूरता की कहानी उसके बचपन से जुडी हुई है, दरअसल सालम के पिता सवरूप सिंह भी जैसलमेर के एक दीवान हुआ करते थे, लेकिन एक दिन उनके द्वारा राजपरिवार के खिलाफ रचे गये षड्यंत्रों का पर्दाफाश होते ही उसका जैसलमेर के भरे दरबार में राजकुमार राय सिंह ने सवरूप सिंह की गर्दन धड़ से अलग कर दिया, उन्हें जब मौत के घाट उतारा गया था, उस समय सालम सिंह भी वहीँ पर उपस्थित थे, उस समय उनकी उम्र मात्र 11 वर्ष की थी। उनके आँखों के सामने उनके बाप की हत्या होते हुए देखने के बाद से सालम सिंह बदले की भावना से भर उठे और उसने यह ठान लिया कि वह एक दिन जैसलमेर के किले पर अपना अधिपत्य सथापित करेगा। धीरे-धीरे उसकी उम्र बढती गई और समय के साथ ही साथ उसकी यह हठ भी पहले की अपेक्षा और अधिक मजबूत होती चली गयी जिससे वजह से वह दिन- प्रतिदिन और भी अधिक निर्दयी होता चला गया। उसके जुल्म इतने बढ़ते चले गये कि कोई भी महिला उसके हवेली के आस-पास से गुजर नहीं सकती थी और कोई भी पुरुष किसी बात के समाधान के लिए सालमसिंह के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे।
    सालम सिंह की जुल्मो का सबसे पुख्ता सबूत एवं कुकर्म के दृश्य कुलधरा गांव  में मिलता है, कुलधरा की एक लड़की सालम को पसंद आ गयी फिर क्या था उसे पाने के लिए सालम ने उस गाँव के नीवासियों पर जुल्म ढहाना प्रारम्भ कर दिया। अनेक प्रकार के टैक्स वसूली, मार काट एवं अनेको तरह की पाबंदियों से परेशान होकर एक दिन उस गांव के लोगों ने मजबूरन राजा की राजशाही को छोड़ कर रातो-रात जैसलमेर पलायन कर गये। जैसलमेर के राजा को जब उसके जुल्म की जानकारी हुई तो उन्होंने सालम सिंह को देश निकाला दे दिया, लेकिन शातिर दीवान के बहुत गिडगिडाने के बाद राजा ने उसके पद की कद्र करते हुए उसे एक और मौका दिया। बदले की आग से सालम सिंह का संपूर्ण देह जल रहा था फिर भी वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और उसके जुल्म लगातार पहले की तरह जारी रहे।
    इतिहास में कोई ऐसे सबूत नहीं मिलते की सालम सिंह की मौत क्यूँ, कब और कैसे हुई थी, परन्तु किले में मिले गाइड के अनुसार सालम सिंह को उसके परिवार वालों ने ही जहर देकर मार दिया था। सालम सिंह द्वारा इसके अलावा भी कई अन्य हवेलीयां एवं तालाब भी बनवाए थे जिससे इस अय्याश दीवान उसके एक कलाकार होने का सबूत पेश करता है। सालम सिंह द्वारा बनाये गये सालम सागर के नाम का यह तालाब जैसलमेर से मात्र 6 km दूरी पर इस्थित है। यंही पर उसने घुंघरू हवेली भी बनवाई थी।
    कैसे पहुंचे सालम सिंह की हवेली तक:
    जैसलमेर किले से हवेली मात्र 150 मीटर की दूरी पर अमरसागर पोल के पास स्थित है और जिस जगह हवेली बनी है वो रास्ता बहुत तंग एवं ब्यस्त रहता है इसलिए यहाँ के लिये पैदल जाना ही सबसे श्रेयकर है।
    हवेली को वर्त्तमान समय में सालम सिंह के वंशज ही संभालते है इसलिए इसमें घूमने हेतु प्रवेश पाने के लिए टिकेट लेना पड़ता है जिसकी कीमत 50 रुपए ( व्यस्क ) और फोटोग्राफी के लिए 100 रुपए देने होते हैं।
    दीवान के वंशज:
    वैसे तो हवेली में कुछ ख़ास देखने को नहीं मिलता है लेकिन इतिहास में रूचि रखने वाले लोग के अलावा पर्यटक मुख्यतः इसकी वास्तुकला को देखने जाते हैं। घुंघरू हवेली का ज्यादातर हिस्सा आज के समय में जर्जर हालत में है लेकिन कुछ पुराने साज सजावट के सामान के अतिरिक्त अन्य ख़ास आकर्षक वस्तुएं यंहा पर मौजुद नहीं है। यंहा से सीधा पटवा हवेली भी जा सकते है जो यंहा से मात्र लगभग 2 किलोमीटर दूर पर इस्थित है।

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