कंक्रीट के जंगल में
पर्यावरण विचार
उपभोगी संस्कृति का
यह सब है संताप।
तुलसी के बिरवा से लेकर
वटवृक्ष की छांव
पीपल,पाकड़, पंचवटी की
नहीं सुनी पुकार।
एक दिवस पर कर लेते
कितना कुछ निर्वाह
जीवन में जो शामिल था
भूल गए व्यवहार।
नदिया, पर्वत जल संचय का
कहां रहा सम्मान।।
– दिलीप अग्निहोत्री







