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    साहित्य साधना का सम्मान

    By June 23, 2019Updated:June 23, 2019 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    हृदय नारायण दीक्षित ने साहित्य और सियासत दोनों में विशिष्ट मुकाम बनाया है। वह ग्रामीण क्षेत्र से चुनाव लड़ते हुए पांच बार विधान सभा के सदस्य बने, प्रदेश में कैबिनेट मंत्री रहे, इस समय विधान सभा के अध्यक्ष है। अपने निर्वाचन क्षेत्र या आवास पर मिलने आये ज़न सामान्य के बीच उनका बिल्कुल गंवई रूप रहता है। चर्चा में ग्रामीण समस्याएं होती है, उनके समाधान का प्रयास होता है। लेकिन उनकी लेखनी से अलग रूप दिखाई देता है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य जीवंत हो उठता है। लेखन में अद्भुत प्रवाह, अपनी विशिष्ट भाषा शैली। छोटे वाक्यों की रचना के विशेषज्ञ। इसे वह शब्द अनुशासन की परिधि में रखते है। हमारे ऋषियों ने जिज्ञाषा और प्रश्न करने को महत्व दिया। हृदय नारायण में सतत जिज्ञाषा है, वह प्रश्न करते है। फिर उसका उत्तर तलाशते है। वामपंथी विचारकों को तर्क संगत जबाब देते है। राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रेरणा देते है।
    हृदय नारायण दीक्षित की साहित्य साधना का बहुत बार सम्मान हुआ है। जून को कोलकत्ता में उन्हें सम्मानित किया गया। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी भी मौजूद थे। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक इस समारोह में शामिल होने के लिए विशेष रूप से वहां गए थे। नाईक ने हृदय नारायण दीक्षित शुभकामना दी। बताया कि मेरा उनसे पूर्व से परिचय रहा है। मुंबई के हिंदी व मराठी समाचार पत्रों में उनके लेख निरन्तर पढ़ता था। उनके लेख बहुत सहज एवं रोचक होते हैं। उन्होंने  अनेक पुस्तकों की रचना की गयी है। पिछले महीने उनकी दो पुस्तकों मधु अभिलाषा और हिन्द स्वराज का पुनर्पाठ का राम नाईक ने  लखनऊ में  विमोचन किया था।
    राम नाईक का कहना है कि  सदगुणों से युक्त हृदय नारायण  दीक्षित एक उच्चकोटि के साहित्यकार और राजनेता हैं। विधान सभा का सफल संचालन करने की विशेषता उनमें है। विधान मण्डल के संयुक्त सदन के सम्बोधन के समय उनकी उपस्थिति में पूरा भाषण पढ़ा है। वह वास्तव में प्रज्ञा पुरूष हैं। जिनका व्यक्तित्व अनुकरणीय है।हृदय नारायण दीक्षित को श्री बड़ाबाजार कुमार सभा पुस्तकालय, कोलकाता डाॅ हेडगेवार प्रज्ञा सम्मान प्रदान किया गया था। राम नाईक इस समारोह में मुख्य अतिथि थे।
    हृदय नारायण दीक्षित को डाॅ हेडगेवार प्रज्ञा सम्मान में स्मृति चिन्ह, अंग वस्त्र तथा एक लाख रुपये की धनराशि का चेक देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी, विशिष्ट अतिथि लक्ष्मी नारायण भाला, आयोजक एवं अध्यक्ष श्री बड़ाबाजार कुमार सभा पुस्तकालय  प्रेम शंकर सहित बड़ी संख्या में विशिष्टजन भी उपस्थित थे। राम नाईक ने श्री बड़ाबाजार कुमार सभा पुस्तकालय को अपनी पुस्तक चरैवेति चरैवेति  की हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, सिंधी एवं गुजराती की प्रति भेंट की।
    चरैवेति को सफलता का मूल मंत्र बताया। उन्होंने कहा कि कोलकाता डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कर्मस्थली रही है।  राम नाईक ने उनकी पुण्य तिथि के पूर्व संध्या पर आज उन्हें नमन किया। राम नाईक ने कहा कि उनका सौभाग्य है कि उन्हें कुमार सभा कोलकाता द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में आने तथा अच्छे वक्ताओं को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। यह सम्मान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डाॅ हेडगेवार के नाम पर दिया जाता है। उनकी स्मृति, विलक्षण प्रतिभा, संगठन शक्ति और एकता के मंत्र को प्रणाम करता हूँ। डाॅ हेडगेवार के विचार आज साकार हो रहे हैं। वे एक महामानव थे जिनके द्वारा रोपा गया पौधा आज वट वृक्ष बन गया है। उन्होंने कहा कि डाॅ  हेडगेवार हम सबके लिये प्रेरणा पुंज हैं।
    पश्चिम बंगाल के राज्यपाल  केसरी नाथ त्रिपाठी ने कहा कि श्री बड़ाबाजार कुमार सभा पुस्तकालय का यह शताब्दी वर्ष है जो किसी भी संस्था के लिये गौरव की बात है। डाॅ हेडगेवार के नाम पर तीस वर्षों से यह सम्मान दिया जा रहा है। हृदय नारायण दीक्षित जी को आज यह ‘प्रज्ञा सम्मान’ मिला है। उन्हें अनेक भूमिकाओं में देखा है। वह राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में रहते हुये साहित्य का सृजन करते रहे हैं। अपने लेखन से बहुत बड़ा साहित्य कोष तैयार किया है।
    डाॅ हेडगेवार ने भारतीय संस्कृति के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी और भारतीयता उनका मूल मंत्र था। हृदय नारायण दीक्षित ने कहा कि जीवन में जनता एवं समाज के साथ काम किया है, जिसके लिये आज यह सम्मान प्राप्त हो रहा है। डाॅ  हेडगेवार के नाम से जुड़ा सम्मान मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुये कहा कि आज ऐसे दो राज्यपालों से सम्मान प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ जिन्होंने जनता के लिये काम किया है।  दुनिया का प्राचीनतम ज्ञान का ज्ञानकोष है ऋगवेद। डाॅ हेडगेवार ने संगठन विज्ञान का आविष्कार किया।  सेवा भाव पर जोर दिया। डाॅ हेडगेवार का सपना सबको एक सूत्र में पिरोना था।
     हृदयनारायण दीक्षित ने साहित्य व सियासत दोनों में महारथ दिखाई है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय की समृद्ध परंपरा को गरिमापूर्ण ढंग से आगे बढ़ाया है। जमीनी व चुनावी राजनीति में आदर्श स्थापित किये। राजनीतिक व्यस्तता के बाद भी अध्ययन व लेखन का समय निकालना साधारण बात नहीं है। लेखन भी ऐसा जिसमें वैदिक संस्कृति की व्यापक आधारभूमि रहती है। इनसे संबंधित विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में कालम लिखने वाले वह पहले व्यक्ति है।
     प्राचीन वांग्मय के अध्ययन की रुचि जगी, तो उसमें भी प्रवीणता प्राप्त की, इसे उनके लेखन में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हृदय नारायण दीक्षित ने राजनीति और साहित्य दोनों में उच्च प्रतिमान स्थापित किये।
    वह उच्च कोटि के विद्वान, चिंतक व लेखक है। वह भारतीय संस्कृति और दर्शन के विख्याता होने के साथ प्राचीन वैदिक साहित्य और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि को मिलाकर सदैव नए विषय प्रस्तुत करते है। इसी कारण लोग उन्हें पढ़ना और सुनना पसंद करते है। वैदिक साहित्य के साथ साथ इतिहास , विज्ञान,व विश्व की तमाम सभ्यताओं के जानकार है। वह देश के चर्चित स्तम्भकार है। ऋग्वेद, उपनिषद,गीता दर्शन,सहित सभी विषयों पर उन्होंने तीस से अधिक ग्रन्थ लिखे है। उनके लेखन में जिज्ञाषा की भूमिका है। वह जितने उच्च कोटि के लेखक है, उतने ही गम्भीर पाठक भी है। वह महाप्राण निराला, प्रताप नारायण मिश्र, शिवमंगल सिंह सुमन के क्षेत्र से विधायक है। उनकी परम्परा को हृदय नारायण दीक्षित ने गरिमापूर्ण और नए रूप में आगे बढ़ाया है।

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