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    मैं तो आप को अपना नवरत्न बनाना चाहता हूं?

    By June 26, 2019 Featured No Comments4 Mins Read
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    Post Views: 702
    तुलसीदास के समय में अकबर हुए। खैर आप जैसे चाहें इस बात को समझ लें। पर हुआ यह कि अकबर ने तुलसी दास को संदेश भिजवाया कि आ कर मिलें। संदेश एक से दो बार, तीन बार होते जब कई बार हो गया और तुलसी दास नहीं गए तो अकबर ने उन्हें कैद कर के बुलवाया। तुलसी दरबार में पेश किए गए। अकबर ने पूछा कि, ‘ इतनी बार आप को संदेश भेजा आप आए क्यों नहीं?’ तुलसी दास ने बताया कि, ‘मन नहीं हुआ आने को। इस लिए नहीं आया।’ अकबर ज़रा नाराज़ हुआ और बोला कि, ‘आप को क्यों बार-बार बुलाया आप को मालूम है?’ तुलसी दास ने कहा कि, ‘हां मालूम है।’ अकबर और रुष्ट हुआ और बोला, ‘आप को खाक मालूम है !’ उस ने जोड़ा कि, ‘मैं तो आप को अपना नवरत्न बनाना चाहता हूं, आप को मालूम है?’ तुलसी दास ने फिर उसी विनम्रता से जवाब दिया, ‘हां, मालूम है।’ अब अकबर संशय में पड़ गया। धीरे से बोला, ‘लोग यहां नवरत्न बनने के लिए क्या नहीं कर रहे, नाक तक रगड़ रहे हैं और आप हैं कि नवरत्न बनने के लिए इच्छुक ही नहीं दिख रहे? आखिर बात क्या है?’
    तुलसी दास ने अकबर से दो टूक कहा कि, ‘आप ही बताइए कि जिस ने नारायण की मनसबदारी कर ली हो, वह किसी नर की मनसबदारी कैसे कर सकता है भला?’
    हम चाकर रघुवीर के पढ़ो लिखौ दरबार
    अब तुलसी का होहिंगे, नर के मनसबदार।
    – तुलसीदास
    अकबर निरुत्तर हो गया। और तुलसी दास से कहा कि, ‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। अब आप जा सकते हैं।’ तुलसी दास चले गए। और यह नवरत्न बनाने का अकबर का यह प्रस्ताव उन्हों ने तब ठुकराया था जब वह अपने भरण-पोषण के लिए भिक्षा पर आश्रित थे। घर-घर घूम-घूम कर दाना-दाना भिक्षा मांगते थे फिर कहीं भोजन करते थे। शायद वह अगर अकबर के दरबारी बन गए होते तो रामचरित मानस जैसी अनमोल और अविरल रचना दुनिया को नहीं दे पाते। सो उन्हों ने दरबारी दासता स्वीकारने के बजाय रचना का आकाश चुना। आज की तारीख में तुलसी को गाली देने वाले, उन की प्रशंसा करने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे पर तुलसी का यह साहस किसी एक में नहीं मिलेगा। शायद इसी लिए तुलसी से बड़ा रचनाकार अभी तक दुनिया में कोई एक दूसरा नहीं हुआ। खैर यह किस्सा जब खत्म हुआ तो मैं ने कहा कि गनीमत थी कि तुलसी दास अकबर के समय में हुए और यह इंकार उन्हों ने अकबर से किया पर खुदा न खास्ता जो कहीं तुलसी दास औरंगज़ेब के समय में वह हुए होते और यही इंकार औरंगज़ेब से किया होता , जो अकबर से किया, अकबर ने तो उन्हें जाने दिया, लेकिन औरंगज़ेब होता तो? वहां उपस्थित लोग एक सुर से बोले, ‘सर कलम कर देता तुलसी दास का!’
    सच यही है। एक निर्मम सच यह भी है और कि हमारा दुर्भाग्य भी कि हम सब लोग आज औरंगज़ेब के समय में ही जी रहे हैं। तो सर कलम होने से बचाना भी एक बेबसी है। बेकल उत्साही का एक शेर है :
    बेच दे जो तू अपनी जुबां, अपनी अना, अपना ज़मीर
    फिर तेरे हाथ में सोने के निवाले होंगे।
    सो सोने के निवाले हाथ में लिए लोगों की संख्या बेहिसाब बढ़ गई है, यह हम सभी हाथ बांधे, सांस खींचे देखने को अभिशप्त हैं। तो मित्रो, ऐसे निर्मम समय में ब्लाग एक ऐसी खुली खिड़की है, एक ऐसी धरती है, एक ऐसा आकाश है जो आप को बिना ज़मीर बेंचे, अपनी अना और जुबां बेंचे अपनी बात कहने का गुरुर देता है। सोने के निवाले जाएं भाड़ में ! किसी का दरबार जाए भाड़ में। जो दरबारी जीवन जीने और इस की कीमत बेज़मीर हो कर चुकाते हैं, अपनी अना, अपनी जुबां क्षण-क्षण सुविधाओं की भेंट चढ़ाने में अपनी शान समझते हैं, उन्हें यह उन की शान मुबारक ! कई लोग अपने-अपने ब्लाग पर भी यह सब कर ही रहे हैं तो अपनी बला से। यह उन का अपना आकाश है, उन का अपना चुनाव है। यहां तो कलम और आज़ादी सलामत है तो हम सलामत हैं, हमारी दुनिया सलामत है। हमारी अना, हमारी जुबां, हमारा ज़मीर सलामत है।
    – दयानन्द पांडेय, सरोकारनामा से साभार

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